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The Whistling West [Part 1 of 2]--a Hindi Horror and Mystery Story

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The Whistling West [Part 1 of 2]--a Hindi Horror and Mystery Story

यह कहानी अविनाश पांडे की है, जो शहर में पला-बढ़ा है और तराई के धंसारी जिले के सरकनबाड़ी गांव में सितारा पेपर मिल्स में क्वालिटी कंट्रोल ऑफिसर के रूप में कार्यभार संभालता है। फैक्ट्री में वह अजीब स्थानीय प्रथाओं, जैसे हर जगह मिट्टी की मूर्तियाँ और लोहे के सिकल रखे जाने, को देखता है। प्लांट मैनेजर सुरिंदर जोगी उसे फैक्ट्री के पिछले हिस्से में केवल दोपहर में काम करने का निर्देश देता है और पश्चिमी दिशा के खेतों और जंगलों में जाने से सख्त मना करता है। अपनी पहली ड्यूटी के दौरान, अविनाश को दीवार से खरोंच की आवाजें सुनाई देती हैं और खेतों में काले बॉल जैसी तेज हलचलें नजर आती हैं। वह स्थानीय किसान हरीश लाल सिंह से दोस्ती करता है और उसके गांव में रात बिताने का फैसला करता है। रात में, जब वह चारपाई पर सो रहा होता है, उसे सीटी की आवाज, सड़े मांस की गंध, और पीली रोशनी की चमक महसूस होती है। हरीश लाल उसे जल्दी से घर के अंदर ले जाता है, जहां उसकी पत्नी निर्मला दरवाजे बंद कर देती है। बाहर एक अज्ञात प्राणी घर के चारों ओर घूमता है और दरवाजे को सूंघता है। रात के अंत में, हरीश के तबेले से एक जानवर की दर्दनाक चीख सुनाई देती है, जिससे हरीश भावनात्मक रूप से टूट जाता है। यह घटना सरकनबाड़ी गांव में रहस्यमयी और भयावह परिस्थितियों की शुरुआत का संकेत देती है।

Transcription

3663 Words, 16728 Characters

Hindi
वक्ता 1 अविनाश पांडे का पहला इम्प्रेशन जब वो धंसारी जिले के सरकनबाड़ी गांव पहुंचा ये था कि शहरों में पले बड़े होने के कारण उसने अपनी जिंदगी में ऐसी विशाल खुली। कभी नहीं देखी थी। अपनी नई नौकरी की जॉइनिंग के लिए तराई की घाटियों में पहुंचा अविनाश जहाँ भी नजरें दौड़ाता उसे दूर दूर तक फैले 10 फिट लंबी घास के खेती नजर आते। इन खेतों के बीच हर कुछ किलोमीटर की दूरी पर सैकड़ों गांव बसे थे। और जो खेतों के ही बीच से गुजरती पतली सड़कों के माध्यम से एक दूसरे से जुड़े हुए थे। धंसारी की सबसे बड़ी और जरूरी सड़क जीस पर चल रही एक जीप पर सवार होकर अविनाश अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहा था। एक सीमेंट और स्टील की अन्य बिल्डिंगों से भरे कम्पाउंड बना कर रुकती थी, जहाँ क्वालिटी कंट्रोल ऑफिसर की हैसियत से आए अविनाश को अगले दिन से अपनी नई ड्यूटी शुरू करनी थी। सितारा पेपर मिल्स इस फैक्टरी का नाम था और यहाँ हर घड़ी चहल पहल जारी थी। पहले दिन ही जब अविनाश ने कंपाउंड एंटर किया रेजिडेंशियल क्वार्टर्स में अपना सामान रखने से पहले ही प्लांट ऑपरेशन्स मैनेजर सुरिंदर जोगी ने उसका कंपाउंड में स्वागत किया और उसे फैक्टरी का टूर देने लगे। बड़े ही नो नॉनसेंस किस्म के आदमी थे वो। उम्र में अविनाश से बड़े और उनकी बोलचाल में एक ठहराव जो किसी को भी मजबूर करते उनकी बातों पर गौर करने के लिए योगी जी ने अविनाश को कंपाउंड के हर हिस्से से रूबरू करवाया और इस दौरान उसने ये नोटिस किया कि जगह जगह पर। हर छोटे कोने या खोपचे में मिट्टी से बनी भगवानों की मूर्तियों के साथ साथ लोहे या स्टील के बने तराती यानी सिकल के छोटे खिलौने जैसी चीजें रखी गई थी, जिसे अविनाश ने गेस किया कि ये किसी तरह की कोई लोकल प्रैक्टिस टोटका। या सुपरस्टीशन था। अंत में जब घूम घाम कर जोगी जी अविनाश को फैक्टरी के पिछले हिस्से में लेकर आए, उनका पहले से ही गंभीर मिजाज़ कुछ और सीरियस हो गया। फैक्टरी के बाकी हिस्सों के मुकाबले। जहाँ तरह तरह की मशीनों और वर्कर्स के हल्ले, गुल्ले का शोर हर पल जारी था। यहाँ इस बैकयार्ड जैसे एरिया में सन्नाटा छाया हुआ था। केवल पास बने कुछ बड़े टैंकर्स की एक गहरी हम सी आवाज ही हवा में गूंज रही। वक्ता 2 नीचे। वो उधर वो स्लग बैंक्स है। वक्ता 1 जोगी जी ने समझाते हुए कहा। वक्ता 2 यहाँ वेस्ट वाटर और वोटपल पाकर मिलता है और फिर यहाँ से दूर आउटलेट्स में डिस्चार्ज हो जाता है। इधर तुम्हारा काम सिर्फ महीने में एक बारी का है। यहाँ टैंक्स में डिस्चार्ज की प्यूरिटी चेक करनी है तुमने? पर ये काम सिर्फ दोपहर में करना होगा। याद रखिएगा सूरज ढलने के बाद यहाँ कोई नहीं आता है। वक्ता 1 अविनाश को जोगी जी की ये वोर्डिंग कुछ और लगी। जोगी जी ने ये नहीं कहा था कि सूरज ढलने के बाद यहाँ कोई काम नहीं होता या यहाँ आना। अलाउड नहीं है बल्कि ये कहा कि यहाँ कोई आता नहीं था। उनके शब्दों की ये चॉइस अविनाश को जमी नहीं, लेकिन उसने उस पल कुछ कहा नहीं। चुपचाप जगह की इंस्पेक्शन करी वो और जोगी जी एक ऊंचे कैटवॉक। यानी स्टील के बने एक पतले ब्रिज पर खड़े थे, जो जमीन से कुछ पांच मंजिलें की उचाई पर था और जहाँ से नीचे फैक्टरी के बैकयार्ड में खड़े वेस्ट डिस्पोजल टैंक्स के साथ साथ कंपाउंड की सीमेंट दीवारें और उनके पार बसे। 10 फिट ऊंचे नेपियर घास से भरे खेत साफ दिखाई दे रहे थे। कुछ था इन खेतों के बारे में जो अविनाश को किसी वजह बेचैन कर रहा था। घास इतनी लंबी थी कि अपने भीतर इंसान तो क्या हाथी जैसे किसी विशाल जानवर को भी छिपा लें। कंपाउंड की लंबी ऊंची दीवार में केवल एक ओपेनिंग थी, एक दरवाजा जो बाहर खेतों में खुलता था, ये दरवाजा लोहे का बना था और उस पर लोहे की जंजीरों के साथ एक लोहे का मोटा ताला भी लगाया गया था। इस ताले पर जंग लगा हुआ था। जो ये बयां कर रहा था कि ये दरवाजा सालों से नहीं खोला गया था। सब मिलाकर फॅक्टरी के इस पूरे एरिया में एक उदासीनता सी थी जो केवल उसके वीरान पड़े होने का परिणाम नहीं थे। वक्ता 2 कंपनी रूल बुक की कॉपी तुम्हारे कमरे में रख दी गई है। अच्छे से पढ़ लेना उसे। लेकिन हाँ, एक रूल है जो तुम्हें कहीं नहीं लिखा मिलेगा, लेकिन जिसे तुमने फॉलो करना है, फॉलो करोगे तो बेहतर है वो खेत देख रहे हो वहाँ पश्चिमी दिशा में। वक्ता 1 योगी जी ने बायीं तरफ इशारा करते हुए कहा जहाँ खेतों का एक हिस्सा। शितिज पर बने जंगलों के ऊंचे थपेड़ों से जा मिल रहा था। वक्ता 2 उस ओर कभी मत जाना वहाँ जाने का तुम्हारा कोई मतलब नहीं बनता है। वक्ता 3 कोई खास वजह? सर? वक्ता 2 जंगल है वहाँ बहुत पुराना जंगली जानवर निकल कर आते हैं, कभी कभी वहाँ से। दूर रहोगे तो तुम्हारा ही भला है। वक्ता 1 जब वो वहाँ से निकल रहे थे, एक बार अविनाश ने पीछे मुड़कर देखा, पश्चिमी छोर पर बिछे खेतों की ओर वो दावे के साथ तो नहीं कह सकता था लेकिन। एक पल उसे लगा जैसे जंगलों के पास ऊंची घास के बीच एक काला शेप देखा। उसने गुंबद जैसे आकार का जैसे किसी बड़े से प्राणी की कुंभ निकली। आगे को झुकी हुई पेट हो, विनाश ने अपनी पलकें झपकाए और। कुछ नहीं कुछ नहीं था वहाँ केवल चारों ओर फैली घास अविनाश ने अपना सर हिलाते हुए अपनी नजरें वापस फैक्टरी की दिशा में फेरी माहौल का असर था। ये उसने खुद को समझाया होप्फुली आने वाले दिनों में। उसके पास ऐसे लोकल सुपरस्टीशन को हवा देने की फुर्सत नहीं होने वाली थी और ऐसा हुआ भी। पहले कुछ दिन तो अविनाश काम में इतना मशरूफ था कि उससे किसी और चीज़ से कोई लेना देना हुआ ही नहीं। काम के पहले हफ्ते ही उसका कनेक्शन बैठा। हरीश लाल सिंह, जो लगभग अविनाश की उम्र का था और यहाँ एक लोकल फार्मर होने के साथ साथ सितारा पेपर मिल्स का प्रोक्योरमेंट सुपरवाइजर भी उसका काम था। फॅक्टरी और लोकल फार्मर्स के बीच तालमेल बिठाना। और लोकल फार्मर्स के यहाँ से ट्रैक्टर्स में भरकर नेपी और घास के घने बंडल लाना, जिन्हें फिर प्रोसेसिंग यूनिट्स में डालकर उनका पेपर बनाया जाता था। हरीशलाल की ड्यूटी अक्सर उपज के सीज़न में सुबह छः से दोपहर दो तक होती थी। और ये अविनाश की ड्यूटी टाइपिंग से मैच करती थी। जीस कारण उनके बीच बातचीत छिड़ी और फिर दोस्ती पैदा हुई। दोपहर दो के बाद हरीश के दिन का दूसरा पड़ाव शुरू हुआ करता था जहाँ वो घर जाकर कुछ देर पहले अपनी बीवी के साथ मिलकर खेती बाड़ी किया करता था। और फिर अपने गाय भैंसों को चारा खिलवाने ले जाया करता था। दिनभर की इस मेहनत को वो होटों पर एक मुस्कुराहट लिए करता था और हमेशा यही कहता था कि। वक्ता 4 ये गांव, ये जमीन जिंदगी हमारे बाप दादा की देन है उनके। बलिदानों की इन्हें व्यर्थ कहीं से जाने दे सकते हैं। वक्ता 1 हरीश के इस रोज़ की मेहनत को देखकर अविनाश को भी अपने काम को शिद्दत से करने की प्रेरणा मिलती थी। 1 दिन। बाहर ही आई इस लक्ष्य टैंक्स का पहला इंस्पेक्शन करने की योगी जी की बातों को ध्यान में रखते हुए अविनाश दोपहर लंच से पहले ही अपनी ड्यूटी करने निकल पड़ा। हमेशा की तरह फैक्टरी के इस हिस्से में सन्नाटा छाया हुआ था क्योंकि यहाँ एक जनाब ही मौजूद नहीं था कोई। सिक्योरिटी गार्ड तक नहीं। अविनाश का काम था नीचे ग्राउंड लेवल पर बने टैंक्स के फिल्ट्रेशन सिस्टम्स और उनमें रखे स्लच की केमिकल। कंसिस्टेंसी का इंस्पेक्शन करना। उसके बाएं तरफ सीमेंट की वो 20 फिट ऊंची दीवार खड़ी थी। और हवा में सल्फर की हल्की कंध अविनाश को कुछ पल कुछ घुटन सी महसूस हुई और उसने अपने काम पर ध्यान लगाए रखा। स्लग का एक सैंपल इकट्ठा करने के लिए अविनाश टैंक के निचले हिस्से में बने कुछ वाल्व्स की तरफ झुका। कुछ सेकण्ड्स अविनाश अपनी जगह पर फ्रीज हो गया। उसके कान और उसका पूरा कॉन्सेंट्रेशन उसके लेफ्ट साइड खड़ी दीवार की तरफ के मृत्यु उसने स्लच टैंक के वॉल्व को बंद किया। अविनाश के रोंगटे खड़े हो गए। आवाज ऐसी थी जैसे किसी नुकीली चीज़ जैसे नाखूनों से कॉन्क्रीट की दीवार पर खरोच लगाई जा रही थी। ना चाहते हुए भी उसने खुद को दीवार की तरफ जाते हुए पाया। पासाकर अपना कान दीवार से लगाते हुए पाया। क्या एक कोई जानवर था? लग तो कुछ ऐसा ही रहा था अविनाश की नजर दीवार पर उससे बस कुछ 20 कदम आगे ही बने लूहे के गेट पर गई। यूं तो गेट सॉलिड था और उसके पट्टे। बाहर के नजारे को पूरी तरह से ब्लॉक कर रहे थे। अविनाश को ना जाने क्यों ऐसी फीलिंग आ रही थी कि बाहर जो कोई भी था वो उसे यहाँ अंदर कम्पाउंड में खड़ा महसूस कर पा रहा था। धीरे से। अविनाश गेट से पीछे हटा और फैक्टरी की बिल्डिंग की तरफ बढ़ने लगा। वो बिल्डिंग के बेक डोर तक पहुंचने ही वाला था कि अचानक अविनाश इस बार दौड़ पड़ा। उसने पीछे मुड़कर गेट की तरफ नहीं देखा। नहीं, अभी नहीं, लेकिन वो। फैक्टरी की तरफ भी नहीं दौड़ा। उल्टा उसने लेफ्ट ऑन दिया। ऊपर तक जाती सीढ़ियों की तरफ उसका दिल तेजी से धड़क रहा था, लेकिन उसने अपना संयम बनाए रखा। वापस उसी स्पॉट तक गया जहाँ से पहले दिन। उसने योगी जीके साथ पांच फ्लोर की उचाई से फैक्टरी के पिछले हिस्से का नजारा देखा था। कैटवॉक से देखने पर ना बिल्डिंग के पास ना उससे मीलों दूर किसी भी दिशा में अविनाश को कुछ अटपटा नजर आया। बाहर दीवार और खेतों के बीच खाली जमीन की एक चौड़ी पट्टी थी, जो दीवार की हैट और कैटवॉक के देखने के अगल से अविनाश को पूरी तरह से नजर नहीं आ रही थी। इसलिए वो दावे के साथ नहीं कह सकता था। वहाँ कोई था या नहीं लेकिन माहौल को देखकर तो ऐसा ही लग रहा था कि। वहाँ कुछ नहीं था और इस बात की पुष्टि करने के लिए अविनाश काफी देर वहाँ कैटवॉक पर खड़ा रहा। किसी के भी सामने आने का इंतजार कर रहा लेकिन आगे फिर ना कोई और हलचल हुई ना किसी भी दिशा से कोई नई आवाज उठी। पश्चिमी दशा में बसे खेत और उससे आगे बिछा वो जंगल भी शांत थे। दूर दूर तक किसी का नामो निशान नहीं। अविनाश अपनी जगह पर घूमा वापस अपने कैबिन की तरफ जाने के लिए, लेकिन वो पूरी तरह से मुड़ा भी नहीं था की उसकी नजरों के कोने में एक। काला फ्लैश सा नजर आया। उसे एक तेज हलचल या मूवमेंट जो दूर कहीं खेतों में हुई, ऐसा लगा जैसे कोई छोटी चीज़ बॉल के आकार की हवा में घास की उचाई से बस कुछ ही इंच पर उछली और फिर दोबारा नीचे घास में चिप गई। जैसे किसी ने एक काले रंग की बॉल हवा में फेकी और फिर वापस पकड़ ली। अविनाश की सांसे कुछ पलों के लिए थम गई। ये हलचल कम्पाउंड की दीवार से कुछ चार से पांच किलोमीटर्स की दूरी पर हुई थी। उतरी दिशा में अविनाश ने उस स्पॉट पर कुछ सेकण्ड्स फोकस किया। लेकिन वहाँ फिर और कुछ नहीं हुआ। लेकिन इससे पहले कि वो इससे अपनी नजरों का धोखा करार कर सकता वो वैसे ही एक और मूवमेंट इस बार पश्चिमी दिशा से कम्पाउंड वॉल से कुछ सात आठ किलोमीटर्स आगे एक। काले बॉल जैसी चीज़ हवा में फिर से उछली, ज्यादा उचाई तक नहीं गई वो घास के ऊपरी टिप्स से बस कुछ एक इंच ऊपर ही जीस कारण अविनाश उसे ठीक से देख नहीं पाया। जीस जगह से वो बॉल जैसी चीज़ उछली और फिर वापस जमीन की तरफ गिरी थी। वहाँ हमेशा की तरह। घास हवा में ओले से ही झूल रही थी। उसमें ऐसी कोई असामान्य हलचल नहीं जो ये बयां कर सके कि उसके भीतर कोई मौजूद था। और इन दो पोज़ीशन के बीच यानी जहाँ बॉल पहले उछली थी और अब फिर दूसरी बार कुछ। डेढ़ दो किलोमीटर्स की दूरी थी जिसका मतलब ये था कि ये जो कोई भी था गेदु में छिपा वो बेहद तेजी से ऐसी टेरेन यानी ऐसी उबड़ खाबड़ भूमि पर भाग सकने के काबिल था। अविनाश इसके बाद कैटवॉक पर एक पल और नहीं रुका। मौका ही नहीं दिया। उसने खुद को किसी भी तरह का डर या डाउट अपने अंदर पैदा होने देने का। ये डेफिनिट्ली कोई किसान था जो खेतों से होकर गुजर रहा था, उसके साथ उसका कोई बच्चा था या बच्चे? जो आपस में बॉल फेंककर खेल खेल रहे थे। हाँ, अविनाश ऐसा होते हुए इमेजिन कर सकता था और इस बात का सेंस भी बनता था। लेकिन डर और लोजिक के बीच अक्सर कोई तालमेल नहीं बैठ पाता है। इसी कारण यूं तो अविनाश के पास। जो उसने देखा था उसका एक लॉजिकल एक्सप्लनेशन था दिमाग में लेकिन फिर भी वो उस पूरे दिन कुछ कुछ बेचैनी रहा और इसी बेचैनी के चलते शाम को ड्यूटी खत्म होने के बाद वो अपने फ्लैट में जाने के बजाए। अपने अंडर काम कर रहे कुछ वर्कर्स के साथ उनके गांव के लिए निकल पड़ा, जो फैक्टरी से ब्य रोड कुछ 15 से 20 मिनटों की दूरी पर ही था। इसी गांव में हरीश लाल रहता था और अविनाश को देखकर उसका चेहरा गिर गया। अविनाश बिना इनविटेशन बिना किसी वॉर्निंग के उसके घर पहुंचा था, लेकिन हरीश लाल ने बुरा नहीं माना। उल्टा उसने अविनाश का खुले मन से स्वागत किया, अपने घर और गांव की सैर कराई और फिर अपने आस पड़ोसियों से भी मिलवाया। खेतों की तरफ बार बार नसरे घूमा रहे। अविनाश ने आखिर एक प्वाइंट पर अपना सवाल पूछ ही डाला। आखिर इसी वजह से तो वो यहाँ आया था। वक्ता 3 तुम सबको जंगली जानवरों से डर नहीं लगता क्या? मैंने सुना है जंगलों से निकल कर आते हैं कभी? वक्ता 4 पुरखों का खेत है, पांडे जी यहाँ हमरी जान बचती है, धरती में कान लगाएंगे ना तो तुरंत ही बता देंगे कि फसल कैसे होगी, कब होगी और कब कौन सा बिन बुलाया मेहमान यहाँ प्रकट हो जाएगा। वक्ता 3 और जो पश्चिमी दिशा में वो। खेत और जंगल बसें उनके बारे में कोई बात है क्या? वक्ता 1 इतने समय में पहली बार अविनाश ने किसी लोकल से इस बारे में कोई डायरेक्ट सवाल पूछा था। अब तक उसने खुद को यही समझाए रखा था कि ऐसी अंधविश्वासी बातों से वो जितनी दूरी बनाए रखे उतनी कम है। लेकिन अब लेकिन अब दोपहर की घटना के बाद उसके अंदर एक तरह की अर्जेंसी बैठ गई थी। जिसे वो नज़रअन्दाज़ नहीं कर पा रहा था। वक्ता 4 अरे इन सब बातों की चिंता तुम काहे कर रहे हो अविनाश बाबू? वक्ता 1 हरीश लाल ने हँसते हुए कहा, लेकिन उसकी इस खुशमिजाज़ी के पीछे एक तनाव सा था बेहद। हल्का और उसके भीतर कहीं दफन इस कदर की पलके झपकाने पर आप उसे मिस कर दोगे, लेकिन अविनाश हरीश लाल को किसी दिलचस्प किताब की तरह पढ़ रहा था। वक्ता 4 आओ तुमको अपने खेत दिखाता हूँ फिर तुम समझोगे हमें इनका। कोई डर क्यूँ नहीं? वक्ता 2 है। वक्ता 1 इतना कहकर हरीशलाल ढलते सूरज की आड़ में भी लालटेन लिए अविनाश को अपनी खेत दिखाने ले गया। अविनाश ने भी आनाकानी नहीं की। हरीशलाल को अपनी मेहमान नवाजी करने दी। खेत वाकई सुंदर और शांत थे, लेकिन। पूरे समय ऊंची घास के बीच अविनाश को लगता रहा जैसे कोई कहीं पास से उन्हें देखे जा रहा था। जब सूरज ढलने लगा। हरीश लाल ने ऐलान कर दिया कि अविनाश रात उसके यहाँ ही काटेगा। फिर? गांव भर से उसके कुछ दोस्त इकट्ठा हुए। देसी शराब की महफिल जमी और अविनाश भी मूड में आ गया। हरीश लाल के घर के पिछड़े आंगन में चटाईयां और चारपाईयां बिछीं स्टील के क्लासेज निकाले गए और गांव के लगभग आधे आदमियों और बड़ों की बैठक हुई। अविनाश का इंटेरोगेशन किया गया, उससे शहर के किस्से मांगे गए और बदले में अविनाश ने गांव वालों से उनकी कहानियों सुनी। लेकिन कहानियों उनकी रोज़मर्रा की जिंदगियों और ड्रमों की थी ना कि खेतों या उनसे जुड़ी किसी भी तरह की विसंगतियो की। इसका रिसाल्ट ये था कि जब रात गहराई और बातें खत्म होने लगी। अविनाश को जो आज दोपहर में झटका लगा था उसका असर अब तक काफी फीका पड़ चुका था। अगर चिंता की कोई बात होती तो टॉपिक जरूर छिड़ता और शाम से तो वो इन्हीं खेतों के पास बैठा हुआ था। हरीश लाल के बैकयार्ड में। लेकिन उसने फिर कुछ अजीब एक्सपीरियंस नहीं किया जो शाम को कुछ देर के लिए उसे वो फीलिंग महसूस हुई थी जैसे कोई उन्हें देख रहा था, वो भी अब दोबारा उसके अंदर नहीं उठी। इसलिए अविनाश थोड़ा निश्चिंत हो गया। इतनी हिम्मत मिल गई उससे कि अब वो बाहर आंगन में बिछी चारपाई पर खुले में ही सोने को राजी हो गया था। हाँ, वो बात अलग थी कि एक दूसरे चारपाई पर हरीशलाल भी उससे बस कुछ ही कदमों की दूरी पर लेटा हुआ था। उसे अकेला ना महसूस होने देने के लिए। लेकिन 50 मीटर्स की दूरी पर उस ऊंची घास के खेत का होना अब अविनाश के लिए कोई बहुत बड़ी या चिंता की बात नहीं रह गई थी। अविनाश देर रात अपनी चारपाई पर ऐसे लेटा हुआ था जैसे यहाँ वेकेशन पर आया हो। अपने हाथों को अपने सर के पीछे जोड़े वो आसमान में सितारे गिनते हुए रिलैक्स कर रहा था। ग्रामीण इलाके की शांति और सुंदरता का पूरा लुत्फ उठा रहा और ऐसा करते करते उसकी आंख भी लग गई। नींद उस पर जैसे नशे की तरह चढ़ी। कुछ घंटों के लिए वो दुनिया से पूरी तरह कट ऑफ हो गया। लेकिन फिर एक झटका जिसे वो डोर जू से असल जिंदगी और जागृति से जुड़े हुए थे उसे किसी ने हल्का सा खींचा। अविनाश की भारी पलकें धीमे से खुलीं। और यूं तो अंधेरे में कह पाना मुश्किल था। कितना वक्त बीत गया था? उसे यकीन था कि उसने कम से कम एक आधे घंटे की नींद तो निकाली ही थी। अविनाश झट से उठकर चारपाई पर बैठा आवाज जैसे एक ही वक्त पर। दूर कहीं से और पास कहीं से आ रही थी। तेज चल रही हवाओं में घुली होने के कारण उसके एग्ज़ैक्ट लोकेशन का पता कर पाना नामुमकिन था, लेकिन इतना साफ था कि ये आवाज खेतों की दशा से आ रही थी। अविनाश की गर्दन बायीं तरफ उड़ी। घास हवा में जोरों से झूल रही थी लेकिन पूरे चाँद की रौशनी में भी उसे उनके बीच कुछ अलग सा नजर नहीं आ रहा था। कोई जानवर या इंसान भी नहीं। फिर भी उसे वही पुरानी फीलिंग अब दुबारा महसूस होने लगी थी जैसे कोई उन्हें देख रहा था। एक पल के लिए हवा का रूख बदला और उसके साथ अविनाश तक एक गंध पहुंची सड़े गले मांस की गंध घास के बीच पीली रौशनी की दो बिंदुएं चमकी एक पूरे सेकंड के लिए भी नहीं। और अविनाश को लगा किसी भी वक्त मौत उसे अपने पंजों में झकड़ने वाली थी, लेकिन फिर किसी ने उसके हाथ पर अपना हाथ रखा और अविनाश ने जब चौंकते हुए पीछे देखा, हरीशलाल अपनी चारपाई से उठ चुका था और अपने होंठो पर एक ऊँगली रख। अविनाश को उसका पीछा करने का इशारा कर रहा था। अविनाश ने भी वक्त बर्बाद नहीं किया। दोनों वाद में फटाफट हरीशलाल के घर की तरफ पड़े जहाँ बेक डोर पे हरीश की बीवी निर्मला भावे पहले से ही खड़ी उनका इंतजार कर रही थी। जैसे ही अविनाश और हरीश लाल ने चौखट पार की, भाभी जी ने घर के सभी खिड़की दरवाजे छट से बंद कर लॉक कर दिए। कुछ लंबे मिनटों के लिए तीनों जने वहीं बैकडोर के पास खड़े रहे। कभी एक दूसरे को देख रहे तो कभी अपना ध्यान बाहर बैकयार्ड की तरफ घूमा रहे। वहाँ उठती किसी भी नई आवाज़ की अपेक्षा में सीटी की धुन अभी भी रात में गूंज रही थी, लेकिन एक लय में नहीं रुक रुक कर और उसके साथ उसके साथ एक बहुत धीमी सी आवाज़ और थी जो एक पॉइंट पर। घर के दरवाजे के एकदम करीब आ गए, जैसे बाहर बैकयार्ड में कोई था, ऐसा लग रहा था जैसे कोई जानवर हरीश लाल के घर के पिछले बरामदे का चप्पा चप्पा छान रहा था और एक पॉइंट पर तो वो के भी करीब आया क्योंकि दरवाजे के ठीक। दूसरी तरफ ही उसके हाफने की आवाज आ रही थी जैसे उसने अपनी नाक दरवाजे से चिपका दी थी। कुछ पलों के लिए ये आवाज एकदम बंद बढ़ गई। जानवर ने शायद तीनों को सूंघ लिया था। अविनाश डर के मारे तो कुछ सेकण्ड्स एक सांस भी अंदर नहीं खींच पाया। मिनट्स बीते या घंटे पता ही नहीं चला। एक पॉइंट पर तो अविनाश को लगा जैसे वहीं खड़े खड़े सुबह हो जानी थी और फिर दूर कहीं से एक और नई आवाज़ उठी। एक दर्दनाक चीख किसी जानवर की जो रफली उसी दिशा से आ रही थी जहाँ हरीशलाल का तबेला खड़ा था, हरीशलाल एकदम से उजला और दरवाजे की तरफ पड़ा। लेकिन नैन वक्त पर निर्मला भाभी ने उसका हाथ थाम कर उसे रोक लिया। दोनों के बीच आँखों ही आँखों में कुछ बातें हुई, बहस हुई जिसके बाद फिर हरीशलाल केवल अपनी मुठियों को कसकर बांधे अपनी जगह पर खड़ा रहा। उसके चेहरे पर अब डर के साथ साथ कई सारे और भाव नहीं झलक रहे। क्रोध, शर्मिंदगी और गिल्ट और फिर हरीशलाल की आंखें, डर और शॉक से एकदम गोल हो गई और अपने कानों पर हाथ रख। जैसे किसी तीखे शोर से खुद को बचा रहा हो। वो जमीन पर अपने घुटनों के बल गिरा, उसका माथा आगे को झुका, फर्श को छू रहा हथेलियां दोनों कानों को ढक रही। अविनाश ये सब देखकर समझ चुका था कि ये रात भले ही कट जानी थी। लेकिन सरकनबाड़ी गांव में अंधेरे बादल गिरने अभी शुरू ही हुए थे।

Podcast Summary

Key Points:

  1. अविनाश पांडे तराई के धंसारी जिले के सरकनबाड़ी गांव में सितारा पेपर मिल्स में क्वालिटी कंट्रोल ऑफिसर के रूप में कार्यभार संभालता है।
  2. फैक्ट्री में हर जगह मिट्टी की मूर्तियाँ और लोहे के सिकल जैसी चीजें रखी हैं, जो स्थानीय अंधविश्वास का संकेत देती हैं।
  3. प्लांट मैनेजर सुरिंदर जोगी अविनाश को पश्चिमी दिशा के खेतों और जंगलों में जाने से मना करता है, केवल दोपहर में वहां काम करने की अनुमति देता है।
  4. अविनाश को फैक्ट्री के पिछले हिस्से में अजीब खरोंच की आवाजें और काले बॉल जैसी हलचलें नजर आती हैं, जो उसे परेशान करती हैं।
  5. वह स्थानीय किसान हरीश लाल सिंह से दोस्ती करता है और गांव में रात बिताता है, जहां उसे रात में सड़े मांस की गंध और पीली रोशनी के साथ एक भयावह प्राणी का सामना करना पड़ता है।
  6. हरीश लाल और उसकी पत्नी निर्मला अविनाश को घर में छिपा लेते हैं, और बाहर एक जानवर के घूमने की आवाजें सुनाई देती हैं।
  7. रात के अंत में एक जानवर की दर्दनाक चीख सुनाई देती है, जो हरीश के तबेले की ओर से आती है, और हरीश लाल भावनात्मक रूप से टूट जाता है।

Summary:

यह कहानी अविनाश पांडे की है, जो शहर में पला-बढ़ा है और तराई के धंसारी जिले के सरकनबाड़ी गांव में सितारा पेपर मिल्स में क्वालिटी कंट्रोल ऑफिसर के रूप में कार्यभार संभालता है। फैक्ट्री में वह अजीब स्थानीय प्रथाओं, जैसे हर जगह मिट्टी की मूर्तियाँ और लोहे के सिकल रखे जाने, को देखता है। प्लांट मैनेजर सुरिंदर जोगी उसे फैक्ट्री के पिछले हिस्से में केवल दोपहर में काम करने का निर्देश देता है और पश्चिमी दिशा के खेतों और जंगलों में जाने से सख्त मना करता है। अपनी पहली ड्यूटी के दौरान, अविनाश को दीवार से खरोंच की आवाजें सुनाई देती हैं और खेतों में काले बॉल जैसी तेज हलचलें नजर आती हैं। वह स्थानीय किसान हरीश लाल सिंह से दोस्ती करता है और उसके गांव में रात बिताने का फैसला करता है। रात में, जब वह चारपाई पर सो रहा होता है, उसे सीटी की आवाज, सड़े मांस की गंध, और पीली रोशनी की चमक महसूस होती है। हरीश लाल उसे जल्दी से घर के अंदर ले जाता है, जहां उसकी पत्नी निर्मला दरवाजे बंद कर देती है। बाहर एक अज्ञात प्राणी घर के चारों ओर घूमता है और दरवाजे को सूंघता है। रात के अंत में, हरीश के तबेले से एक जानवर की दर्दनाक चीख सुनाई देती है, जिससे हरीश भावनात्मक रूप से टूट जाता है। यह घटना सरकनबाड़ी गांव में रहस्यमयी और भयावह परिस्थितियों की शुरुआत का संकेत देती है।

FAQs

ट्रांसक्रिप्शन में योग्यता के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है। यह माना जा सकता है कि क्वालिटी कंट्रोल के लिए संबंधित डिग्री या अनुभव की आवश्यकता होगी।

पहले दिन जोगी जी ने अविनाश को फैक्ट्री का पूरा दौरा कराया और उसे समझाया कि उसे महीने में एक बार दोपहर में स्लज टैंक्स की प्यूरिटी चेक करनी है।

हरीश लाल सिंह प्रोक्योरमेंट सुपरवाइजर था। उसका काम फैक्ट्री और स्थानीय किसानों के बीच तालमेल बिठाना और नेपियर घास के बंडल लाना था।

उसे दीवार पर नाखूनों से खरोंचने जैसी तेज आवाज सुनाई दी, जो बहुत डरावनी थी।

यह स्पष्ट नहीं है कि वे क्या थीं। अविनाश ने सोचा कि शायद कोई किसान अपने बच्चों के साथ खेतों में गेंद खेल रहा था, लेकिन वे बहुत तेजी से चल रही थीं।

हरीश लाल ने टालमटोल किया और कहा कि वह उसे अपने खेत दिखाएगा, जहां वह समझ जाएगा कि उन्हें डर क्यों नहीं है। उसने कोई सीधा जवाब नहीं दिया।

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