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The Cloakroom [Part Four]--a Hindi Supernatural Mystery and Horror Story

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The Cloakroom [Part Four]--a Hindi Supernatural Mystery and Horror Story

यह प्रतिलेख एक रहस्यमयी और डरावनी कहानी को दर्शाता है, जहाँ एक रेलवे स्टेशन पर अजीब घटनाएं घट रही हैं। अर्जुन नाम का एक कर्मचारी इन घटनाओं का सामना करता है, जिसमें समय का उलट-फेर, काली परछाई, और एक रहस्यमयी पेंडेंट शामिल है। सहनीसर के फोन कॉल के बाद स्टेशन को खाली कर दिया गया, और प्रशासन ने इसे गैस लीक बताया। लेकिन अर्जुन को लगता है कि यह सब एक बड़ी साजिश का हिस्सा है। वह एक पुरानी डायरी पढ़ता है, जिसमें स्टेशन की भूतिया कहानियाँ दर्ज हैं, जिसमें एक काले कपड़ों वाला यात्री और एक अंग्रेज महिला का जिक्र है। अर्जुन को अपने पीछे एक काली आकृति का पीछा करते हुए महसूस होता है, जो अंततः उसके फ्लैट के बाहर आ खड़ी होती है। सहनीसर उसे चेतावनी देते हैं कि इन घटनाओं को नजरअंदाज करना ही सही है, लेकिन अर्जुन विद्रोह करता है और सच्चाई जानने की कोशिश करता है। कहानी में डर, रहस्य, और मनोवैज्ञानिक तनाव का मिश्रण है, जो पाठक को अंत तक बांधे रखता है।

Transcription

4761 Words, 21683 Characters

Hindi
वक्ता 1 सहनीसर के द्वारा किया गया फ़ोन कॉल कोई प्रैंक कोई मजाक नहीं था। उनके कॉल करने के कुछ ही घंटों के अंदर रातोरात वेस्टर्न सेंट्रल रेलवे का ये डिविजनल हेडक्वार्टर और एक बहुत ही अहम स्टेशन इवैक्यूट कर दिया गया। इतनी कोवोर्डिनेशन अर्जुन ने सालों में नहीं देखी थी। एएसएमएस की कड़ी ड्यूटी और रूटीन के अंतर्गत भी नहीं और ऐसा लग रहा था जैसे शहर की सारी पुलिस फोर्स को आरपीएफ के साथ काम पर लगा दिया गया था। सारी की सारी ब्यूरोक्रेसी और स्टेट मशीनरी एकजुट होकर काम कर रही थी। क्नॉइस। और ये अपने में ही कोई बहुत बड़ा चमत्कार था। यहाँ तक कि जब अर्जुन ने आखिर एक मीडिया 1 को प्रीमाइसेज़ एंटर करते देखा, उसने नोटिस किया कि गाड़ी से निकल रहे दोनों रिपोर्टर और कैमरा पर्सन उम्र वाले थे और स्टेशन के पुराने स्टाफ को अच्छे से जानते थे। रिपोर्टर और सहनी सर के बीच काफी देर बातचीत हुई और फिर जब रिपोर्टर अपनी ड्यूटी करने निकला, देश की जनता को ये इन्फॉर्म किया गया कि स्टेशन किसी गैस लीक के चलते खाली कर दिया गया था। अर्जुन का सर चकरा रहा था। एएसएमएस का काम कुछ घंटों के लिए दोगुना कर दिया गया था। उन्होंने अपनी सारी फोर्स लगाकर स्टेशन तक आते और यहाँ से जाती सारी ट्रेन्स को रिस्केड्यूल करना था पर इतनी भारी ड्यूटी के चलते भी अर्जुन बार बार खुद को डिसट्रैक्ट होता पा रहा था। उसके साथियों के भी हाल कुछ बेहतर नहीं थे। वो भले ही उसके मुकाबले यहाँ लंबे समय से काम करते आ रहे थे लेकिन ये साफ था कि उन्होंने ऐसी कोई सिचुएशन पहले यहाँ फेस नहीं की थी। ये सब उनके लिए उतना ही नया था जितना अर्जुन के लिए। और माहौल में छाई टेंशन इतनी तेज इतनी तीव्र थी। ऐसा लग रहा था जैसे वो किसी चाकू के धार की तरह सबको चीर कर रख देगी। एक पॉइंट पर तो एक क्लर्क ने स्टेशन कंट्रोल रूम के कांच की खिड़कियों को चादरों से भी ढक दिया। ताकि अंदर काम कर रहे कोई भी असिस्टेंट स्टेशन मैनेजर्स बाहर प्लेटफॉर्म्स की तरफ ना देख पाए। जब ये हुआ अर्जुन की बेचैनी इतनी बढ़ गई उसकी उंगलियां ठीक से टाइप भी नहीं कर पा रही थी लेकिन किसी तरह उसने रात काटी क्नॉइस। और फिर अगला आधा दिन में डबल टाइम पर लगे सभी ए एस एमएस चाय कॉफ़ी के बलपूते पर अपनी ड्यूटी पूरी कर गए और जब बाहर ही स्टेशन से बाहर निकल अपने फ्लैट्स की तरफ बढ़ने की आई, सबने नोटिस किया कि स्टेशन के अंदर तो क्या उसके बाहर? कुछ एक किलोमीटर के रेडियस में भी जिंदगी पर जैसे विराम लगा दिया गया था, ट्रैफिक डाइवर्ट कर दिया गया था और हर थोड़ी दूरी पर पुलिस बैरकेट्स पे कुछ दो से तीन ऑफिसर्स की टुकड़ी ऐसे तैनात खड़ी नजर आ रही थी जैसे यहाँ किसी नेशनल इमरजेंसी का माहौल बन गया था। शायद बन भी गया था, लेकिन अर्जुन को क्या पता, वो तो अपने बुरे से बुरे सपनों में भी गेस नहीं कर सकता था कि यहाँ आखिर चल क्या रहा था? वक्ता 2 घटना चाहे छोटी हो या बड़ी, सबको तुमने नज़रअन्दाज़ कर देना है। सबके बारे में तुमने ही सोचना है कि ये सच नहीं है, ये तुम्हारा वहम है। वक्ता 1 इससे बेहतर समय नहीं था। अपने बॉस की हिदायत को दिल से लगाने का हर ऑप्शन भी क्या थे अर्जुन के पास? लेकिन अगर आप आग में झुलसती बिल्डिंग के बीचों बीच फंसे हो क्या आप अपनी ओर बढ़ती लपटों को इग्नोर कर पाओगे? आने वाले कुछ दिनों में वक्त जैसे थम सा गया। स्टेशन पर सिर्फ कुछ पुराने एम्पलॉईस का एक छोटा क्रू अलाउट था। और बाकी सबको स्टेशन के बाहरी प्रीमाइसेज़ में बनी रेजिडेंशियल बिल्डिंग में स्टैंड बाई पर रहने के ऑर्डर्स दिए गए थे। अर्जुन का फ्लैट तीसरे फ्लोर पर था और बिल्डिंग स्टेशन से दूर फेस करती थी। इसलिए खिड़की से काम के नजारे नहीं देखे जा सकते थे। क्नॉइस लेकिन अर्जुन फिर भी दिन भर खुद को विंडो सिर पर ही बैठा पाया करता था। उसके पास करने के लिए कुछ और खास था भी नहीं। ना? रात को उसे नींद आती, ना दिन भर उसे चैन मिलता, उसका पेंडेंट हर थोड़ी देर में जैसे गर्मी के भपके छोड़ता। उसके छाती से लगा तांबे का मेडालियन जलती बुझती बत्ती की तरह कभी गर्म तो कभी ठंडा और फिर दोबारा गर्म हो जाता। लेकिन अर्जुन अपनी पूरी जान लगाकर उसे इग्नोर कर रहा था। अपने मन में उससे संबंधित एक ख्याल भी आने नहीं दे रहा था वो। अपनी इस टेंपररी लीव के दूसरे दिन अर्जुन की सुबह एक अजीब नजारे के साथ हुई। हमेशा की तरह बेड से उठते ही जब वो अपने रूम की खिड़की की तरफ बढ़ा, उसने देखा कि दूर क्षितिज पे काले बादल इकट्ठा हो रहे थे। लेकिन ये कोई साधारण तूफान नहीं लग रहा था। बादल कम और धुएं के विशाल गुब्बारे ज्यादा लग रहे थे, जो मानो दूर कहीं झेलस रही किसी भयंकर आग की देन लग रहे थे। सलेटी से ज्यादा ये बादल काले रंग के थे और ये केवल आसमान पर ही नहीं बल्कि धुंध के पर्दों की तरह जमीन की ओर भी बढ़ रहे थे। जैसे काले धुएं की बनी कोई बहुत ऊंची दीवार आसमान से जमीन तक खिची शहर की ओर बढ़ रही थी, उसे कुचलने के लिए। लेकिन अर्जुन की चिंताएं केवल उसी तक सीमित थी। ये बादल ना बिल्डिंग के बाकी रेजिडेंस को कुछ खास डरावने लग रहे थे और ना न्यूज़ पर आने वाले किसी तूफान से ज्यादा उनके कोई मायने थे तो फिर अर्जुन को ये महज। बारिश क्यों नहीं लग रही थी? उस दिन? हर घंटे के अंत पर पास आते इस स्टॉर्म क्लाउड को ट्रैक करने के लिए अर्जुन अपनी खिड़की की तरफ बढ़ता रहा। हर घंटे के अंत पर बादलों का घेरा आसमान में कुछ और फैला नजर आता। अर्जुन ने बहुत कोशिश की खुद को डिस्ट्रैक्ट करने की। फाइनली जब कोई और तरकीब काम नहीं कर पाई उसे सहनी सर के द्वारा दी गई डायरी उठानी ही पड़ी जिसे वो अब तक पढ़ना टाल रहा था। शायद उसे डर था किसी। कड़वी डरावनी सच्चाई का, जो उसे इन पन्नों में छिपी मिल सकती थी। डायरी काफी पुरानी थी और यूं तो सानी। सर के मुताबिक ये उनके दादाजी को बिलौंग करती थी। असल में इसे कई लोगों ने कई सालों कई दशकों में मिलकर लिखा था। सबसे पुरानी एंट्रीज सहनी सर के ही किसी पूर्वज की थी। उनके परदादा शायद एयठीन 22 में सबसे रीसेंट एंट्री भी 100 साल पुरानी थी। सभी एंट्रीज में एक कामन बात ये थी कि वो किसी लोग बुक की एंट्रीज की तरह लिखी गई थी। टु दी पॉइंट और डायरी मेंटेन करने वालों ने इस पर हर दिन नहीं लिखा था, ना ही अपने दिल की कोई गहरी बातें शेयर की थी। उन्होंने राइटर्स ने केवल वही घटनाएं मेन्शन की थी जिनका उन पर ज़ाहिर तौर पे गहरा असर पड़ा था। अर्जुन ने सबसे पुरानी एंट्रीज से शुरुआत की। वक्ता 3 मार्च 14 एयठीन 22 पिताजी की जमीन आखिर देखी हमने आज 10,000 गज की जमीन है, लेकिन लगती है जैसे पूरी दुनिया को ही खुद में संभालेगी। मार्च 22 एयठीन 22 यहाँ कुछ ठीक नहीं है कभी घर की तरफ पड़ता हूँ तो पीछे जंगल के रास्ते निकल आता हूँ। दरवाजे अपनी मंजिलें तक नहीं पहुंचते। यहाँ में फाइव एयठीन 22। बाबा इस जमीन की कहानियों सुनाया करते थे, कहते थे वो यहाँ कभी भटके राही नजर आएँगे, उन्हें देखकर भी अनदेखा कर देने में भलाई है वहीं करता आया हूँ अब तक लेकिन अब और ढोंग नहीं होता मुझसे। मैं तो इन्हें नज़रअन्दाज़ कर भी दू लेकिन मेरे बच्चे नहीं कर सकते। बच्चों की जिज्ञासा को मिटाया नहीं जा सकता। अगस्त, टेंथ एयठीन 22। ना जाने देश विदेश से किस किस कोने से आते हैं। सब यहाँ खेतों में खोए राहियों की तरह भटककर फिर कभी दुबारा नजर नहीं आते। कुछ घर जाते हैं तो कुछ। डिसेंबर 23 एयठीन 22 पिताजी की सबसे बड़ी गलती यही थी कि उन्होंने हमें इस जगह की गहराइयों का एहसास नहीं कराया। उन्होंने शायद यही सोचा कि अगर वो हमें यहाँ के खतरों का पल पल एहसास नहीं कराएंगे तो हम उन पर। ज्यादा ध्यान नहीं देंगे, उन्हें महत्त्व नहीं देंगे जैसे यहाँ की जीत है ही अगर हम इस जगह पर गौर नहीं करेंगे, हम यहाँ के नियमों को कैसे जायेंगे? वक्ता 1 इन पहली कुछ एंट्रीज के बाद अगली एंट्री सीधा एयठीन 68 की थी। और एक नई हैंडराइटिंग में लिखी गई थी। लेकिन इस बदलाव के बावजूद डायरी एंट्री का स्टाइल वही था जैसे कोई अपनी जिंदगी की छोटी बड़ी घटनाओं को किसी रिपोर्ट की तरह शब्दों में पिरो रहा था। वक्ता 3 जुलाई एयठीन्त एयठीन 68 किस्मत। भी अजीब खेल खेलती है। इस जमीन पर रेलवे लाइन का बिछना जैसे एक ही पल कोई बहुत बड़ा मजाक है और दूसरे ही पल इस दुनिया का सबसे सही फैसला अब यहाँ के यात्रियों को अपनी असली मंजिलें तक पहुंचने में। कोई मुश्किल नहीं होगी। वक्ता 1 इसके बाद की कुछ एंट्रीज एक और बड़े टाइम जंप के बाद लिखी गई थी। तीसरी नई हैंडराइटिंग में। वक्ता 3 सितम्बर 81925 आज स्टेशन पर एक इंग्लिश मैम आई थी। उनके हाथ में एक सुंदर सा पेंडेंट था। चांदी का बना एक दिल हीरों की एक लड़ी से जड़ा एक ऐसा पेंडेंट जो दो हिस्सों में बाटा जा सकता था, जिसके दो टुकड़े हो सकते थे। माँ ऍम के हाथ में एक टुकड़ा था, मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा सितम्बर 91925 आज हमें स्टेशन में एक नया यात्री दिखा। कदमे ज्यादा लम्बा नहीं था, करीब पांच फुट होगा काला सूट पैंट काली टोपी पहनी किसी इंग्लिश साहब की तरह क्या इसका नाता उस अंग्रेजी औरत के साथ है? वक्ता 1 अर्जुन की धड़कनें तेज होने लगी और उसका गला सूखने लगा लेकिन वो आगे बढ़ता रहा। वक्ता 3 सितम्बर 121925 कुछ ठीक नहीं है काला लिबास पहने, उस आदमी को मेरे और उस औरत के अलावा और कोई नहीं देख सकता। और मेम साहब उसे देखकर खुश नहीं है विचलित हो रही हैं स्टेशन पर अजीब किस्म की चीजें होने लगी हैं वक्त जैसे एक ही समय पर तेजी से आगे बढ़ रहा है और कछुए की चाल सा धीमा कभी। घंटों बीत जाते हैं यहाँ, लेकिन गाड़ी पर सुईयां आगे नहीं बढ़ती। सितम्बर 131925 आज एक और नया चेहरा स्टेशन पे कोई बूढ़े बाबा आंखें सलेटी लगभग। दूध से सफेद उनकी पुतलियां ही नहीं थी। बाबा ने केवल इतना कहा कि कड़े फैसले लेने का वक्त आ गया था। सितम्बर 151925 मैंने आज अंग्रेजी माँ ऍम से बात करने की कोशिश करी। लेकिन इससे पहले मैं उनसे कुछ पूछ पाता। उन्होंने केवल इतना कहा कि उनके अपनी निर्धारित ट्रेन पकड़ने का वक्त आ गया है। उस पहले दिन के बाद से उस बाबा का अब कहीं नामो निशान नहीं है। लेकिन काले विभास वाला वो आदमी। स्टेशन पर अब अक्सर दिखाई देता है। अपने साथ जैसे काले बादलों का एक गहरा लिए समझ नहीं आता। वो आगे बढ़ना चाहता है या नहीं या वहीं दूर खड़े रहकर हमारी दुनिया को आगे बढ़ते हुए देखना चाहता है। ना जाने क्या सोच रहा है वो? पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लग रहा है जैसे वो कोई फैसला लेने की कोशिश कर रहा है। सितम्बर 25192510 दिन बीत गए हैं। ना उस अंग्रेजी माँ ऍम का, कहीं नमो निशान है, ना उस काली टोपी पहने उस आदमी का? दोनों आँखों से ऐसे ओझल हो गए हैं जैसे वो यहाँ कभी थे ही नहीं। शायद ये सब कोई बुरा सपना था। काश ये सब कोई बुरा सपना था। वक्ता 1 ये डायरी की आखिरी एंट्री थी। अर्जुन का एक हाथ अपने आप अपने गले में टंगे पेंडेंट तक पहुंचा। उसे ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उसका सीना चीर कर उसके दिल को अपने हाथों में थाम लिया था और अब उसे बिना हिचक बिना दया निचोड़े जा रहा था। तांबे का पेंडेंट हमेशा की तरह जलती बुझती बत्तियों की तरह कभी एकदम गर्म तो कभी एकदम ठंडा होकर फिर दोबारा गर्म हो जाता। जैसे कोई संकेत दे रहा हो या शायद कोई मैसेज ही बयां करना चाह रहा हो, लेकिन अर्जुन ना जाने क्यों इस मैसेज से। चाहकर भी दूर भाग रहा था। खिड़की के बाहर बादल अब काफी करीब आ चूके थे और एक पल अर्जुन को धक्का सा लगा। क्या वक्त इतनी जल्दी गुजर गया था या ये बादल तेजी से पास आ गए थे? काले बादलों के घेरे में बिजली के फ्लैशेस देखे जा सकते थे। जो जैसे पेंडेंट के गर्म ठंडे होने के रिदम से ताल से ताल मिलाते हुए आसमान में दमक रहे थे अर्जुन इस नज़ारे को देखते ही जान गया था कि अब कुछ होने वाला था। चीजें माहौल बदलने वाला था। सबसे पहले समय की चाल बदली। आने वाले दो दिनों में ऐसी कई घटनाएं घटी जहाँ अर्जुन को वक्त का पता नहीं चल पाया। कभी जब उसे लगता कि घंटे बीत गए थे, वो घड़ी की तरफ देखता और उसे एहसास होता कि सुईयां 10 मिनट भी आगे नहीं बढ़ी थी। कभी जब उसे लगता उसे कोई छोटा मोटा काम करे। कुछ सेकण्ड्स ही हुए थे घड़ी चेक करने पर घंटों के बीत जाने का सबूत सामने आता रात 8:00 बजे भी कभी अर्जुन को दूर से देखने पर लगता कि बाहर कितना उजाला है? लेकिन जब वो खिड़की के पास जाकर शटर्स खोल बाहर देखता। बाहर अंधेरा छाया हुआ होता और आसमान में एक भी टिमटिमाता तारा नजर नहीं आता क्योंकि ऊपर तो हर पल बादलों की वही गहरी चादर बिछी हुई थी लेकिन वक्त ही केवल नहीं था। उन फिजिकल लॉज़ में से एक जो आने वाले दिनों में अजीब बर्ताव कर रहा था। तीसरे दिन दोपहर को लंच के बाद कुछ देर अपने मन को शांत करने के लिए वॉक पर निकले अर्जुन के ख्याल उल्टा कुछ और उलझ गए, जब उसने नोटिस किया कि उसकी परछाई बड़ा अजीब सा बिहेव कर रही थी। इकलौते लाइट सोस। यानी बादलों के पीछे छिपे सूरज और अर्जुन के खड़े होने के एंगल से जमीन पर बन रही परछाई कुछ ज्यादा ही लंबी और खिंची खिची सी लग रही थी। कुछ देर जब अर्जुन की नजर उस पर नहीं होती, वो यकीन के साथ कह सकता था कि उसके ना हिलने पर भी ये परछाई हल्की हिलती और उसके हाथ पैरों के मूवमेंट्स के बावजूद कभी स्थिर रहती लेकिन ये सब तेजी से। उसकी नजरों के कोनों में ही होता जीस कारण वो कभी सामने से ये सब होता नहीं देख पाता और इसलिए खुद को इस चीज़ के होने का ठोस सबूत नहीं दे पाता। लेकिन उसे अपने दिल की गहराइयों में पता था कि यहाँ सब कुछ गलत चल रहा था। ऊपर से इसी वक के दौरान कंपाउंड का चक्कर काटते वक्त गेट से बाहर बिछे मेन रोड पर उसने कम से कम पांच बार एक ही लाल रंग की होंडा सिटी इस एरिया का चक्कर काटते हुए देखी। जैसे वो किसी भूल भुलैया या शायद यूं कहा जाए किसी लूप में फंस गई थी। तीसरे राउंड पर कुछ सेकण्ड्स के लिए ही सही पर एक स्पीड ब्रेकर पर धीरे होती इस गाड़ी की खिड़की से अर्जुन ने ड्राइवर को एक झलक देखा। कोई अधेड उम्र की लेडी थी, जो चंद सेकण्ड्स के लिए कॅन्फ्यूज्ड नजर आए, जैसे उन्हें पलभर का होश आया हो और ये रियलाइज हुआ हो कि कुछ ठीक नहीं था यहाँ। लेकिन फिर ये एक्सप्रेशन उतनी ही तेजी से मिट भी गया और अर्जुन को दोबारा फिर वो गाड़ी इस एरिया में नजर नहीं। वक्ता 3 आई? वक्ता 1 अगले दिन ब्रेकफास्ट के दौरान मिस हॉल में अर्जुन को लगा जैसे कोई दूर कहीं से उसका नाम पुकार रहा था। वक्ता 3 अर्जुन? वक्ता 1 मुड़कर जब उसने उस आवाज की तरफ देखना चाहा तो ठीक उसके पीछे डे शिफ्ट का ए एस एम ऋषभ कपाड़िया खड़ा काफी देर से उसका नाम ले रहा था। दोनों के बीच एक फुट की भी दूरी नहीं अर्जुन चौका लेकिन फिर खुद को तेजी से संभाल भी लिया। जब उसने रिषभ से बातचीत छेड़ी वो काम से संबंधित ही कोई आम बात कर रहा था। जैसे इतने दिनों में यहाँ कुछ हुआ ही ना हो। जैसे पिछले चार दिनों से जबलपुर जंक्शन के आधे से ज्यादा स्टाफ को स्टेशन प्रीमाइसेज़ से दूर रहने के ऑर्डर्स नहीं दिए गए हो। जैसे ऋषभ ने बस कुछ दो 3 घंटे पहले ही अर्जुन से यही बातचीत इसी मिस हॉल में ब्रेकफास्ट के दौरान ना की हो। अर्जुन के बर्दाश्त की सीमा खत्म होती जा रही थी। वक्ता 3 तुम्हें समझ नहीं आ रहा यहाँ क्या हो रहा। वक्ता 1 है। अर्जुन ऋषभ पर भड़क पड़ा। आसपास चलते उनके कुछ और कॉलीग्स ने उन्हें मुड़कर देखा। वक्ता 3 क्या मतलब तुम्हारा? ऐसा क्यों जाता रहे हो? जैसे सब कुछ ठीक चल रहा है जैसे लाइफ होर्डिनरी चल रही है यहाँ सबकी? व्हाई इस नोबडी आस्किंग दी डैम क्वेश्चन्स क्या हो रहा है यहाँ? वक्ता 1 मनोरमा अर्जुन की शिफ्ट पार्टनर सिचुएशन को संभालने के लिए आगे बढ़ी, लेकिन अर्जुन के शब्दों और ख्यालों की ट्रैन प्लेटफार्म से निकल चुकी थी और अब उसे रोका नहीं जा सकता था। वक्ता 3 4 दिन हो चूके हैं एक रेलवे स्टेशन को बंद पड़े रेलवे स्टेशन जंक्शन दी लाइव ब्लड ऑफ़ आवर कंट्री कोई अपडेट्स नहीं मिले हैं। हमें अब तक कोई एक्सप्लनेशन नहीं दी गई है कि हुआ क्या? और तुम सब यहाँ बैठे आलू पूरी उड़ा रहे हो। चल क्या रहा है? मीडिया में कोई बात क्यों नहीं हो रही है? ये ये ये सस्पेंशन हमारा कब तक चलेगा? क्यों ये सब इग्नोर कर रहे हो तुम लोग? वक्ता 1 कुछ सेकण्ड्स किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। सब अर्जुन के बर्ताव को देखकर शॉक्ड थे और फिर मनोरमा बोली। वक्ता 4 हम कुछ इग्नोर नहीं कर रहे हैं। हमें बताया गया है ना कि गैस लीक हुआ है इसलिए स्टेशन खाली किया गया है। सब कुछ ठीक हो जाएगा जल्द। वक्ता 3 गैस लीक चार दिनों तक इसी की इन्वेस्टिगेशन चल रही है। यहाँ गैस लीक। और हम अभी भी प्रीमाइसेज़ पर है। स्टेशन के इतना पास हमारी सेफ्टी की किसी को कोई चिंता नहीं। कम ऑन सोचो सभी इस स्टेशन पर क्या क्या नहीं देखा है हम सब ने जिसे हमने इग्नोर करने के लिए कहा गया है, बार बार यहाँ के यही रूल है ना? कब तक दिखावा करोगे तुम सब? क्या तुम्हें वो काला बादल दिखाई नहीं दे रहा? बाहर क्या तुम लोगों को अपनी लाइव्स में हर रोज़ हर पल कुछ अजीव होता महसूस नहीं हो रहा, सब कुछ गलत होता महसूस नहीं हो रहा? वक्ता 1 फिर से कुछ सेकण्ड्स का सन्नाटा कुछ लोगों ने खिड़की के बाहर। बादलों के घेरे को देखा, जिसने अब आसमान के हर इंच को कैद कर रखा था। हवा में हल्की धुंध सी छाई थी। जैसे यही बादल जमीन पर उतर आए थे। कुछ सेकण्ड्स सभी कॅन्फ्यूज्ड नजर आए लाल रंग की होंडा सिटी में बैठी उस लेडी की तरह लेकिन। फिर उनकी ही तरह सबके एक्सप्रेशंस फट से बदल भी गए। सभी अबर्जुन को ऐसे देखने लगे जैसे वो बीतु की बातें कर रहा था। अर्जुन के गले में टंगा पेंडेंट फिर से गर्म होने लगा। जैसे इन्हीं लोगों की तरह उसकी निंदा कर रहा हो या शायद उसे। टॉंट कर रहा हो अपने दिल की गहराइयों में अर्जुन जानता था उसे ये पेंडेंट उसी वक्त उतार कर कहीं दूर फेंक देना चाहिए। इससे भी अच्छा उसे पूरी तरह से नष्ट कर देना चाहिए। लेकिन वो ऐसा कर नहीं पा रहा था। वो जानता था। इन एक से बढ़कर एक अजीब घटनाओं के सिलसिले को खत्म करने का ये एक ही तरीका था लेकिन वो चाहकर भी छाती पर गर्म सिक्के की तरह चिपककर उसकी त्वचा को जला रहे पेंडेंट को खुद से दूर नहीं कर पा रहा था। अर्जुन अपनी जगह पर मुड़ा। और अपने रूम की तरफ बढ़ चला और दुनिया भी अपनी इस नई प्राकृतिक धुन पर आगे बढ़ती गई। अर्जुन के सब्र की सीमा तब पूरी तरह से पार हो गई जब उसी दिन देर रात उसे दूर कहीं ट्रेन्स के हॉर्न्स क्नॉइस। सुनाई देने लगे। वो बेड पर लेटे करवट पर करवट बदले जा रहा था जब किसी ऑर्केस्ट्रा के सिम्फनी की तरह ये हॉर्न एक के बाद एक और कभी एक साथ रात के भी चैन सन्नाटे को चीरने लगे। स्टेशन बंद था। और मीलों तक यहाँ और कोई रेल पटरियां नहीं थीं, लेकिन ये हॉर्न्स बंद होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। इरिटेशन और क्रोध की एक लहर दौड़ पड़ी। अर्जुन के अंदर जिसे वो काबू में नहीं ला पा रहा था इसलिए वो ऐसे ही बेड से उतरा और चप्पल बाजामा में ही बिल्डिंग से बाहर निकला। मन में कोई मंजिल तय नहीं ना दिल में कोई इरादा उसे बस कुछ करना था, चलते रहना था हाथ पैर काम पर लगाकर अपने शरीर को पूरी तरह से धक्का देना था तो उसने दौड़ना शुरू किया। वो कंपाउंड से बाहर नहीं गया और स्टेशन की तरफ उसने एक नजर उठाकर नहीं देखी। बस अपनी घिसी चप्पलों में पागलों की तरह सुबह के 3:00 बजे कंपाउंड का चक्कर काटने लगा। उसका पेंडेंट सुबह से ही ठंडा नहीं हो सका था और अब तो उसे उसकी तेज गर्माहट की आदत पड़ चुकी थी। एक। यही गर्माहट थी जो उसकी त्वचा को छल्ली कर जैसे उसे एक गहरी नींद एक गहरे छलावे में डूबने से रोक रही थी। लेकिन अर्जुन अब एक ऐसे मोड़ पर पहुँच चुका था जहाँ वो ये तय नहीं कर पा रहा था कि ये कोई अच्छी बात। थी भी या नहीं? बारिश का माहौल बन चुका था लेकिन हवा में वो सुहानी मिट्टी की खुशबू का कहीं नमो निशान नहीं था। उल्टा धुंध की एक चादर ने शहर को लपेटे में ले रखा था। और जो बची खुची स्ट्रीट लाइट से इस धुंध को चीर पा रही थी उनकी बिखरी और बुझी रौशनी में पूरी दुनिया ऐसी लग रही थी मानो हाथों से समझ कर दी गई कोई पैंटिंग हो। ऐसे में जीस पल अर्जुन को यकीन होने लगा कि उसे अपने पीछे किसी के होने का अहसास था। वो बिना मुड़े बिना कुछ सोचे दोबारा अपनी बिल्डिंग की ओर भागा। वो किसी के कदमों की आहट नहीं सुन पा रहा था, ना उनकी परछाई देख पा रहा था लेकिन उसे यकीन था कि कोई उसका पीछा कर रहा था। वो बिना रुके भागा। सीढ़ियों पर हाफ हाफ कर गिरने के कगार पर भी वो रुका नहीं। तीसरे फ्लोर की लैंडिंग पर जैसे ही उसने कदम रखा, उसका पूरा शरीर कभी कभी की एक तेज लहर से झुलस उठा और इस कारण न चाहते हुए भी उसकी स्पीड धीमी बढ़ गई। किसी तरह लड़खड़ाते हुए वो अपने फ्लैट के दरवाजे तक पहुंचा, लेकिन उसके हाथ इतनी बुरी तरह से कांप रहे थे कि उसे अपने पॉकेट से चाबी तक निकालने में दिक्कत हो रही थी। अचानक उसका सिर बायीं तरफ स्टेरवेल की ओर मुड़ा जहाँ से वो भाग कर आया ही था। वहीं खड़ा था वो। यात्री अपने उस काले रिबाज में सूट, पैंट, वेस्ट कोट और सर पर एक टॉप हैट पहने वो इतना लंबा इतना विशाल हो चुका था कि फर्श से सीलिंग तक की दूरी में भी समा नहीं पा रहा था। जीस कारण उसे अपनी गर्दन हल्की साइड को झुकानी पड़ रही थी। इतनी गरीबी से अर्जुन इस बार देख पा रहा था कि वो हल्का पारदर्शी था। बस इतना कि उसके पीछे जो कुछ भी मौजूद था उसकी हल्की परछाई सी देखी जा सकती थी। लेकिन गुजरते हर सेकंड के साथ उस का रूप पहले से कुछ और पुख्ता होता जा रहा था। अचानक कॉरिडोर की लाइट पूझी क्नॉइस। अँधेरा इतना गहरा कि अर्जुन अगर अपना हाथ ठीक अपनी आँखों के सामने भी ले आता वो उसे देख नहीं पाता। फिर लाइट दोबारा ऑन हुई यात्री या अर्जुन के कुछ और करीब खड़ा था। जैसे लाइट बंद होने पर कुछ कदम आगे बढ़ गया हो। इस बार अर्जुन ने अपना सारा ध्यान अपने फ्लैट का दरवाजा खोलने में लगाया लेकिन उसकी उंगलियां अब नम होने लगी थी और चाबियां हाथ से फिसलने के कगार पर थी। कॉरिडोर की लाइट्स फिर से ऑफ हुई और इस बार अर्जुन को हवा के एक हल्के झोंके का स्पर्श हुआ जो अपने साथ बेहद हलके पर। सुनाई देने वाले कदमों की आहट लेकर आया। तेजी से चलते हुए उसकी ओर बढ़ रहे। वक्ता 3 नहीं नहीं, नहीं नहीं, नहीं पीसी। वक्ता 1 किसी चमत्कार के चलते चाबी लॉक में घुसी और उसने अपना डोर अनलॉक किया। क्नॉइस। जब अर्जुन ने अपना फ्लैट एंटर किया और दरवाजा अपने पीछे इतनी ज़ोर से बंद कर लॉक किया, दीवारें हल्की काबू उठीं। जैसे ही डोर लॉक हुआ, दूसरी तरफ उससे कोई सोरों से टकरा कर उसे पीटने लगा। अर्जुन की सांसे उसके गले में अटक गई और वो अपनी जगह पर लड़खड़ा कर। जमीन पर धस सा गया उसकी पीठ दरवाजे के सहारे नीचे को सरक रही। वक्ता 2 अर्जुन अर्जुन, दरवाजा खोलो आई थिंक। वक्ता 3 साहनी सर। वक्ता 1 अर्जुन को अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था। साहनी सर ये जरूर कोई जाल था कोई क्नॉइस। उसे अपने झांसे में लेकर उससे दरवाजा खुलवाने का अर्जुन अपनी जगह पर जमा रहा। वक्ता 2 अर्जुन प्लीज़ दरवाजा खोलो, बहुत जरूरी बात करनी। वक्ता 1 है, चाहे ये छल्लावा हो या नहीं। स्टेशन मास्टर की आवाज में साफ सुनाई दे रही डेस्परेशन अर्जुन से बर्दाश्त नहीं हो पा रही थी। उसने पीपल से चेक किया तो सहने सर ही थे पर वो जानता था ये कोई माया हो सकती थी। इतने दिनों से आखिर छलावों के अलावा वो और देख ही क्या रहा था यहाँ? पर अर्जुन ने फिर सोचा कि अगर ये कोई ट्रैप था ही और दरवाजा खोलने पर अगर उसका काम आज तमाम हो जाना था ही तो कम से कम इस एक्सटेंडेड कभी ना खत्म होने वाले नाइटमेयर का तो अंत हो जाता। इससे पहले कि वह खुद को सेकंड गैस करने का मौका तक दे पाता, अर्जुन फटाफट मुड़ा और उसने अपने फ्लैट का दरवाजा खोल दिया। दूसरी तरफ सहनी सर पदावास से लग रहे थे, उनके शर्ट के पहले तीन बटन्स खुले थे और बाल सर पर जैसे चिड़िया का घोंसला बन चूके थे। आँखों के नीचे छाये गहरे काले गड्ढे ये साफ बयां कर रहे थे कि अर्जुन की तरह उनके भी रातों की नींद उड़ चुकी थी और आँखों में अक्सर जो उनके वो चमक नजर आती थी वो पूरी तरह से बूझ चुकी थी। उनके अलावा कॉरिडोर में और कोई नहीं था। अर्जुन ने उन्हें अंदर इन्वैट किया और जैसे ही उन्होंने फ्लैट की चौखट पार की वो लिविंग रूम के एक कोने से दूसरे कोने का चक्कर काटने लगे। वक्ता 2 किस लिए आया हूँ मैं यहाँ? वक्ता 3 सर आप कुछ कह रहे थे कोई इम्पोर्टेन्ट बात? थी। वक्ता 2 हाँ, हाँ, कुछ कुछ मिसिंग है कुछ अह अह अह ढूंढ रहा हूँ मैं शायद। वक्ता 3 सॉरी सर। वक्ता 1 अर्जुन की नजर पास रखे अपने काउच पर पड़े। जीस पर सहनी सर के पूर्वजों की वह डायरी रखी हुई थी। उसने उसे उठाया और सहनी सर को पेश किया। सर ये जैसे ही सहनी सर ने बुक का स्पर्श किया, उनकी आंखें शोक में फैल गई। वो डायरी को किसी लाइफलाइन की तरह थामे अपने घुटनों पर गिर गए और बुरी तरह से कांपने लगे। वक्ता 3 सर, आप ठीक? वक्ता 2 हैं। रोकना होगा तुम्हें यू हॅव टु पूठ एन एन टु थिस भाटिया। वक्ता 1 अर्जुन ने कोई सवाल नहीं पूछा। नहीं कहा सहनी सर से अपनी इस बात को क्लैरिफी करने के लिए वो जानता था सर किस बारे में बात कर रहे थे। वो यह भी जानता था कि वो इस पूरी सिचुएशन पर कैसे विराम लगा सकता था। वो इतने दिनों से अपने सभी सवालों के जवाब जानता था लेकिन जान बूझकर उन्हें इग्नोर कर रहा था। अर्जुन के हाथ दोबारा अपने पेंडेंट की ओर बढ़े मेडालियन फिर से तपने लगा था। लेकिन अर्जुन ने। उसे भी हिचक थामा। वक्ता 2 जाने देना होगा तुम्हें उसे भाटिया नहीं तो वो पूरी तरह से इस दुनिया में आ जाएगा। अपनी पूरी दुनिया साथ लेकर आ जाएगा और फिर और फिर। वक्ता 1 साहनी सर की आँखों में खौफ इतना गहरा था उसे देखकर इतने दिनों में पहली बार अर्जुन को आखिर वो अहम झटका लग ही गया जो उसे कड़ा कदम उठाने पर मजबूर करने वाला था। इतने दिनों से मुश्किल सवालों के मुश्किल जवाबों से दूर भागने के चक्कर में अर्जुन भूल गया था कि यहाँ आखिर क्या दांव पर लगा था दूर कहीं पास आते ट्रेन की सीटी बज रही थी। अर्जुन जानता था अब्बू से आगे क्या करना

Podcast Summary

Key Points:

  1. सहनीसर के फोन कॉल के बाद रेलवे स्टेशन को गैस लीक के बहाने खाली कर दिया गया, और पूरी प्रशासनिक मशीनरी एकजुट हो गई।
  2. अर्जुन और उसके साथियों को स्टेशन से दूर रहने के आदेश दिए गए, लेकिन वहां अजीब घटनाएं होने लगीं - समय का उलट-फेर, काली परछाई, और एक रहस्यमयी पेंडेंट का गर्म-ठंडा होना।
  3. एक पुरानी डायरी में स्टेशन की भूतिया कहानियाँ दर्ज थीं, जिसमें एक काले कपड़ों वाला यात्री और एक अंग्रेज महिला का जिक्र था।
  4. अर्जुन को अपने पीछे एक काली आकृति का पीछा करते हुए महसूस हुआ, जो अंततः उसके फ्लैट के बाहर आ खड़ी हुई।
  5. सहनीसर ने अर्जुन को डायरी दी और चेतावनी दी कि घटनाओं को नजरअंदाज करना ही सही है, लेकिन अर्जुन ने विद्रोह कर दिया।

Summary:

यह प्रतिलेख एक रहस्यमयी और डरावनी कहानी को दर्शाता है, जहाँ एक रेलवे स्टेशन पर अजीब घटनाएं घट रही हैं। अर्जुन नाम का एक कर्मचारी इन घटनाओं का सामना करता है, जिसमें समय का उलट-फेर, काली परछाई, और एक रहस्यमयी पेंडेंट शामिल है। सहनीसर के फोन कॉल के बाद स्टेशन को खाली कर दिया गया, और प्रशासन ने इसे गैस लीक बताया। लेकिन अर्जुन को लगता है कि यह सब एक बड़ी साजिश का हिस्सा है। वह एक पुरानी डायरी पढ़ता है, जिसमें स्टेशन की भूतिया कहानियाँ दर्ज हैं, जिसमें एक काले कपड़ों वाला यात्री और एक अंग्रेज महिला का जिक्र है। अर्जुन को अपने पीछे एक काली आकृति का पीछा करते हुए महसूस होता है, जो अंततः उसके फ्लैट के बाहर आ खड़ी होती है। सहनीसर उसे चेतावनी देते हैं कि इन घटनाओं को नजरअंदाज करना ही सही है, लेकिन अर्जुन विद्रोह करता है और सच्चाई जानने की कोशिश करता है। कहानी में डर, रहस्य, और मनोवैज्ञानिक तनाव का मिश्रण है, जो पाठक को अंत तक बांधे रखता है।

FAQs

डायरी के अनुसार, काले कपड़ों वाला यात्री और अंग्रेज महिला एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। महिला के पास एक पेंडेंट था, और यात्री को केवल वह और डायरी लेखक ही देख सकते थे। महिला यात्री से विचलित थी और उसने अपनी निर्धारित ट्रेन पकड़ने की बात कही थी।

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