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Episode 1: IPC is Dead. Long Live BNS! (Your First BNS Lecture)

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Episode 1: IPC is Dead. Long Live BNS! (Your First BNS Lecture)

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3070 Words, 14501 Characters

Hindi
वक्ता 1 नमस्कार, आज हम एक बहुत ही अहम विषय पर बात करने वाले हैं। भारत का जो क्रिमिनल लॉ है, उसमें एक बहुत बड़ा बदलाव आया है। भारतीय न्यायसहिता 2023 इसने इंडियन पीनल कोड मतलब आई पीसी 1860 जो 1600 साल से भी ज्यादा पुराना था उसकी जगह ले ली है। हमारे पास जो जानकारी है वह इस नए कानून के जो मूल सिद्धांत है, जो बदलाव हुए हैं और इसके पीछे की सोच क्या है, उसे समझने में मदद करेगी। तो चलिए कोशिश करते हैं समझने की कि इस कानूनी बदलाव का सार क्या है क्या बदला है, क्यों बदला है? और हम आप पर मतलब आम नागरिक पर और न्याय व्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ेगा? वक्ता 2 हाँ, नमस्कार, ये वाकई एक बहुत बड़ा कदम है। देखिये किसी भी देश का जो फंडमेंटल क्रिमिनल लॉ होता है, उसको बदलना सिर्फ कुछ सेक्शन बदलना नहीं होता। ये दिखाता है कि समाज की या कह लीजिये व्यवस्था की सोच किस तरफ जा रही है। तो देखते हैं कि यह जो स्रोत है हमारे पास इस बदलाव के बारे में क्या कहता है? तो। वक्ता 1 सबसे पहला सवाल यही कि यह बदलाव क्यों? जानकारी यह बताती है कि नाम में ही एक बड़ा संकेत छुपा है पीनल यानी दंडात्मक से न्याय यानी जस्टिस की तरफ जाना। क्या इसका मतलब यह है कि अब सजा देने से ज्यादा ज़ोर? न्याय देने पर होगा। वक्ता 2 बिल्कुल ऐसा ही लगता है। मतलब? स्रोत के अनुसार विधायिका का इरादा यही दिखाना है कि कानून का मकसद सिर्फ सजा देना नहीं है बल्कि न्याय करना है और यह भी कोशिश है कि जो औपनिवेशिक काल का कानून था, उसे हटाकर एक ज्यादा भारतीय नजरिया लाया जाए। मतलब अपनी जरूरत के। वक्ता 1 हिसाब से। ब्रिटिश कानून हटाकर अपना कानून लेकिन ये इरादा असल में कितना कामयाब होता है वो तो व्यवहार में ही पता चलेगा। वक्ता 2 और इस नई संहिता बी एन एस का ढांचा कैसा है? वक्ता 1 आई पीसी में तो 511 धाराएं थीं, इसमें 358 है तो क्या कानून छोटा हो गया है? सरल हो गया है? वक्ता 2 अच्छा ये देखिये दिलचस्प सवाल है। धाराएं तो कम दिख रही है। हाँ 511 से 358 लेकिन जैसा स्रोत बताता है कई पुरानी धाराओं को या तो मिला दिया गया है, एक साथ या फिर उन्हें उपधाराओं मतलब सब सेक्शंस में डाल दिया गया है तो कॅन्टेंट कम नहीं हुआ है, ऐसा नहीं है। हाँ एक अहम बात ये है कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ़ जो अपराध है। उन्हें अब चॅप्टर पांच में मतलब शुरू में ही जगह दी गई है। एक तरह से प्राथमिकता अच्छा और एक सेक्शन थ्री है, जिसमें नौ उपधाराएं हैं। वो कई जो जनरल प्रिंसिपल थे उनको एक जगह ले आया है। वक्ता 1 जानकारी में आईपीसी और बीएनएस की कुछ समानताओं का भी जिक्र है, जैसे कि ये पूरे भारत में लागू होंगे। और ये लिंग तटस्थ है। मतलब जेंडर न्यूट्रल। वक्ता 2 हाँ, ये कहा गया है लेकिन स्त्रोत थोड़ा स्पष्ट करता है कि यह पूरी तरह शायद सच नहीं है। कुछ अपवाद है जैसे बी एन एस की धारा 63 जो रेप से संबंधित है वह अभी भी जेंडर न्यूट्रल नहीं है। उसमें अपराधी केवल पुरुष और पीड़ित केवल महिलाएं ही हो सकती है। वक्ता 1 अच्छा। ये अभी भी वैसा ही है। वक्ता 2 हाँ, लेकिन हाँ, बाकी ज्यादातर अपराध जैसे मर्डर है। कल्पेबल होमिसाइड चोरी रॉबरी? ये सब जेंडर न्यूट्रल है। इसके अलावा जो मुख्य तत्व बताए गए हैं वो है जवाबदेही। वक्ता 1 अकाउंटेबिलिटी? वक्ता 2 अपराधी की भी और जांच एजेंसी। वक्ता 1 की भी। वक्ता 2 पुलिस की भी। और दूसरा है अपराध की रोकथाम प्रिवेंशन ऑफ़ क्राइम। वक्ता 1 अपराध की रोकथाम इस पर एक सवाल भी है जानकारी में क्या सिर्फ कानून बदलने या सजा बढ़ाने से अपराध कम होते हैं? डेटा तो कुछ और ही कहानी कहते हैं। अक्सर अपराध तो बढ़ते ही दीखते हैं। वक्ता 2 हाँ, यह एक सतत बहस है मतलब हमेशा से यह सवाल रहा है। स्त्रोत भी मानता है कि रोकथाम एक उद्देश्य जरूर है पर ये कितना सफल होता है? ये हमेशा संदिग्ध रहा है चाहे वो पुराना आईपीसी हो या नया। बी एन एस अपराध का तरीका भी बदल रहा है। है ना? शायद असल रोकथाम तो जैसा स्रोत इशारा करता है। सामाजिक सोच बदलने से माहौल बदलने से। और व्यक्ति के मन को बदलने से ही होगी। वक्ता 1 इम्युनिटी सर्विस। ये क्या चीज़ है? वक्ता 2 हाँ, कम्यूनिटी सर्विस ये स्त्रोत के अनुसार पहली बार मुख्य आपराधिक संहिता में शामिल की गई है। हालांकि जुवेनाइल जस्टिस अक्ट जो है, उसके सेक्शन 18 में ये पहले से थी। वक्ता 1 अच्छा बच्चों के लिए पहले से। वक्ता 2 था। इसका मतलब ये है कि कुछ छोटे अपराधों के लिए। जैसे मानहानि हो गया या नशे में हंगामा करना या किसी की प्रॉपर्टी में बिना इजाजत घुसना। ऐसे मामलों में जेल भेजने के बजाय दोषी को कुछ घंटे समाजसेवा करने की सजा दी जा सकती है। वक्ता 1 ये तो काफी अलग है और भी बहुत कुछ नया है जैसे मोब लिंचिंग उसको अब एक खास अपराध माना गया है। आर्गेनाइज्ड क्राइम यानी संगठित अपराध फिर छोटे संगठित अपराध, आतंकवादी गतिविधियों इनको भी साफ साफ परिभाषित किया गया है, है ना? वक्ता 2 हाँ, बिल्कुल ये बहुत महत्वपूर्ण एडिशन है। मोब लिंचिंग का कोई स्पष्ट प्रावधान पहले नहीं था। संगठित अपराध की बात करें तो ये दिलचस्प है। कि ये कॉन्सेप्ट कुछ राज्यों में जैसे महाराष्ट्र में मकोका था, वहाँ पहले से था। वक्ता 1 हाँ, मकोका सुना है। वक्ता 2 हाँ, लेकिन अभी से राष्ट्रीय स्तर पर परिभाषित किया गया है बी एन एस में स्नेचिंग यानी छीना झपटी वो भी एक नया अपराध है। पहले ये आई पीसी में अलग से नहीं था। हालांकि कुछ राज्यों ने जैसे पंजाब, हरियाणा ने अपने संशोधन। वक्ता 1 किए थे। अच्छा। वक्ता 2 और हाँ, हिट एंड रन के मामलों में भी सजा बदली है। खासकर एक सेक्शन 106, दो है। जीस पर काफी विवाद भी हुआ था। वक्ता 1 हाँ, वो ट्रक ड्राइवर्स वाला प्रोटेस्ट याद है। वक्ता 2 और डॉक्टर्स का भी कुछ था शायद हाँ। वक्ता 1 हाँ, बिल्कुल ड्राइविंग समुदाय और डॉक्टर्स दोनों तरफ से उस पर काफी विरोध हुआ। वक्ता 2 था और सेडीशन का क्या? राजद्रोह आईपीसी की धारा 124 है। वो तो बहुत विवादों में रहती थी। क्या उसे हटा दिया गया है? यहाँ देखिए एक पैच है जैसा स्रोत बताता है, विधायिका तो कह रही है कि 124 से हटा दिया गया है, लेकिन जब बी एन एस की धारा 152 को देखते हैं तो लगता है कि शायद इसे हटाया नहीं गया। बल्कि एक नया रूप दे दिया गया है। वक्ता 1 मतलब नाम बदल दिया या दायरा बदल दिया। वक्ता 2 हाँ, कह सकते हैं कि शायद दायरे में कुछ बदलाव किया गया है। शब्द बदले गए हैं तो यह कहना कि पूरी तरह हटिया शायद सही ना हो, इसका पूरा विश्लेषण तो धारा 152 को 124 से तुलना करके ही पता चलेगा। वक्ता 1 अच्छा कुछ और बदलाव जो ध्यान में आते हो। वक्ता 2 हाँ। कुछ और छोटी मोटी चीजें हैं जैसे अब सिर्फ नकली नोट रखना अपने आप में अपराध नहीं है पहले होता था चोरी की परिभाषा को थोड़ा विस्तार दिया गया है, शायद जो नए तरह के अपराध है जैसे डेटा चोरी वगैरह उनको शामिल करने के लिए। वक्ता 1 अच्छा ऑनलाइन वाले हाँ। वक्ता 2 हो सकता है। और जैसा हमने कहा, स्नैचिंग एक नया अपराध है। वक्ता 1 इस बातचीत में अपराध यानी क्राइम और ऑफेन्स यानी ऑफेन्स ये शब्द आ रहे हैं। क्या इनमें कोई कानूनी फर्क है? वक्ता 2 हाँ, बिल्कुल इनमें एक बारीक सा लेकिन महत्वपूर्ण फर्क है। देखिए क्राइम एक बहुत व्यापक शब्द है। इसका मतलब कोई भी नैतिक रूप से गलत काम हो सकता है। कोई पाप हो सकता है, लेकिन कानून जिसे पहचानना है और जिसके लिए सजा तय करता है वह है ओफेन्स ओके तो ओफेन्स वह काम है जिसे कानून ने मना किया है। मतलब प्रोहिबिटेड है और जिसके लिए सजा यानी पनिशमेंट निर्धारित है। तो आप ऐसे समझ लीजिए गैरकानूनी काम। प्लस दंडनीय होना इस इक्वल टु ओफ्फेन्स हर गलत काम दंडनीय नहीं होता, सिर्फ ओफ्फेन्स दंडनीय होता है। वक्ता 1 समझ गए अच्छा तो किसी काम को ओफ्फेन्स मानने के लिए क्या क्या जरूरी है? जानकारी में चार तत्वों की बात की गई है। वक्ता 2 हाँ, ये किसी भी ओफेन्स के आप कह सकते हैं, बेसिक बिल्डिंग ब्लॉक्स है, चार चीजें होनी चाहिए। पहला इंसान मतलब अपराध या तो किसी इंसान ने किया हो या किसी इंसान के खिलाफ़ हुआ हो, जानवर या भगवान इसमें नहीं आते। दूसरा मेन्स रिया ये लैटिन शब्द है जिसका मतलब है गलत इरादा या बुरा आशय सिर्फ इरादा नहीं बल्कि गलत काम करने का इरादा। बैड इंटेन्शन। वक्ता 1 मतलब दिमागी तत्व हाँ। वक्ता 2 बिलकुल गिलटी मैएंड तीसरा है ऐक्टर्स रियस ये भी लेटर है मतलब कोई आपराधिक कृत्य यानी कोई काम करना अक्ट या ना करना वो मिशन। यहाँ ये समझना जरूरी है कि कुछ ना करना भी अपराध हो सकता है। अगर आपकी कोई ड्यूटी थी और आपने वो जानबूझकर नहीं की। वक्ता 1 जैसे कोई उदाहरण। वक्ता 2 जैसे मान लीजिए कोई नर्स है, उसकी ड्यूटी है, मरीज को दवा देना वो जानबूझकर नहीं देती जिससे मरीज को नुकसान होता है तो ये ओमिशन ऐक्टर्सियस माना जाएगा। वक्ता 1 अच्छा और चौथा। वक्ता 2 चौथा है क्षति। यानी कोई नुकसान या हानि और यहाँ सोर्स ज़ोर देता है कि ये नुकसान अवैध होना चाहिए। अगर नुकसान कानूनी प्रक्रिया के तहत हुआ है। जैसे पुलिस ने किसी को कानूनी तोड़कर गिरफ्तार किया तो उसे भले ही परेशानी हुई पर वो कानूनी इंजरी नहीं मानी जाएगी। नुकसान का अवैध होना जरूरी। वक्ता 1 है। इंसान गलत इरादा, गलत काम या ना करना और अवैध नुकसान मिलकर ओफ्फेन्स बनाती हैं। बिल्कुल सही और दंड क्यों दिया जाता है? सजा देने के पीछे क्या सिद्धांत है, क्या सोच काम करती है? जानकारी में कुछ थियरीज का भी जिक्र है। वक्ता 2 हाँ, सजा क्यों दी जाती है, इस पर कई विचार है। स्त्रोत पांच छे मुख्य सिद्धांतों की बात करता है। पहला है निवारक डिटर्रन्ट। मतलब सजा इतनी सख्त हो कि उसे देखकर दूसरे लोग डरे और वैसे अपराध ना करें। एक डर पैदा करना समाज में। वक्ता 1 दूसरों को रोकने के लिए हाँ। वक्ता 2 दूसरा है प्रतिशोधात्मक रेट्रिब्यूटिव यानी बदला लेना। जैसे को तैसा आंख के बदले आंख। स्त्रोत साफ कहता है की भारत इस सिद्धांत को नहीं मानता। वक्ता 1 हाँ, गाँधी जी ने भी कहा था। वक्ता 2 बिलकुल तीसरा है निरोधक प्रिवेंटिव मतलब अपराधी को समाज से अलग कर देना जैसे जेल में डालकर ताकि वो और अपराध ना कर सके। वक्ता 1 फिज़िकली रोक देना। वक्ता 2 हाँ, चौथा और ये महत्वपूर्ण है सुधारात्मक रिफॉर्मिटिव। यानी अपराधी को सुधारना, उसे बेहतर इंसान बनाना। स्रोत कहता है कि भारत का मुख्य ज़ोर इसी पर है। वक्ता 1 अच्छा, हमारा फोकस सुधार पर है। वक्ता 2 हाँ, ज्यादातर जैसे प्रोबेशन अक्ट है, जुवेनाइल जस्टिस अक्ट है। ये सब इसी सोच पर आधारित है और बी एन एस का जो न्याय पर ज़ोर है वो भी इसी से जुड़ता है। अपराधी को सुधार कर समाज में वापस लाना। वक्ता 1 ठीक है। वक्ता 2 फिर एक है प्रायश्चितात्मक मतलब अपराधी को अपनी गलती का एहसास कराना। उसे पछतावा हो जैसे एकांत कारावास सॉलिटरी कन्साइनमेंट का एक उद्देश्य ये भी। वक्ता 1 होता है, और आखरी। वक्ता 2 आखरी है अक्षमताकारी इंकपसिटेशन? मतलब अपराधी को शारीरिक रूप से ऐसा बना देना कि वो अपराध कर ही ना पाए। पुराने जमाने में हाथ काट देना वगैरह होता था। वो आज के समय में मृत्यु दंड को इस कैटेगरी में रख सकते हैं क्योंकि उसके बाद अपराधी अपराध करने में अक्षम हो जाता है। वक्ता 1 तो कुल मिलाकर भारत का झुकाव सुधार की ओर ज्यादा है। वो जो कहते हैं ना अपराध से घृणा करो, अपराधी से नहीं। वक्ता 2 कह सकते हैं कि आदर्श रूप में यही कोशिश है। वक्ता 1 अच्छा, ये सब बदलाव लागू कब से हुए हैं? तारीख क्या है? वक्ता 2 जानकारी के अनुसार राष्ट्रपति की मंजूरी इसे 25 दिसंबर 2023 को मिली थी और ये लागू हुआ है 1 जुलाई 2024 से पूरे भारत में। वक्ता 1 1 जुलाई 2024 से ठीक है और इसका एक्ट नंबर 45 है 2023 का। वक्ता 2 हाँ, एक्ट नंबर 45 ऑफ़ 2023 और इसे भारत गणराज्य के चौहत्तरवें वर्ष में पारित किया गया था। वक्ता 1 अच्छा, अब एक अहम सवाल जो पुराने केस चल रहे थे 1 जुलाई 2024 से पहले वाले। जो आईपीसी के तहत दर्ज हुए थे, उनका क्या होगा? उन पर कौन सा कानून लगेगा, प्रक्रिया कौन सी होगी? वक्ता 2 हाँ, ये बहुत प्रैक्टिकल और थोड़ा जटिल सवाल है। स्रोत बताता है कि इस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है। उनका कहना है कि देखिए भले ही अपराध आईपीसी के तहत हुआ हो। और सजा भी शायद उसी के हिसाब से मिले, लेकिन जो प्रक्रिया है मतलब जांच और ट्रायल की प्रक्रिया वो नए कानून यानी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता बी एनएसएस के तहत चल सकती है। वक्ता 1 अच्छा ऐसा क्यों? वक्ता 2 इसके पीछे तर्क ये दिया गया है कि जो पूरी पुलिस मशीनरी है, जांच एजेंसी है। वो अब नए सिस्टम यानी बी एन एस के हिसाब से त्रिनेड हो रही है। काम कर रही है तो एक ही समय में दो अलग अलग प्रक्रियाएं चलाना। कुछ केस पुराने सीआरपीसी से कुछ नए बी एन एस से ये बहुत ज्यादा कॅन्फ़्यूज़न पैदा करेगा और मुश्किल होगा। वक्ता 1 हाँ, ये बात तो है बहुत गड़बड़ हो सकती है। वक्ता 2 इसीलिए प्रक्रिया के लिए नए कानून यानी बी एन एस का इस्तेमाल किया जा सकता है। भले ही अपराध पुराने कानून आई पीसी का हो। वक्ता 1 ये काफी दिलचस्प बात है और बी एन एस के साथ वो दो और कानून क्यों बदले गए? बी एन एस जो सीआरपीसी की जगह आया और बीएस ए जिसने एविडन्स अक्ट की जगह ली। वक्ता 2 क्योंकि ये तीनों आप कह सकते हैं एक ही सिक्के के तीन पहलू हैं। ये आपस में बहुत गहरे जुड़े हुए हैं। देखिए अगर आप बी एन एस में अपराध की परिभाषा बदलते हैं या कोई नया अपराध जोड़तें हैं या नई तरह की सजा लाते हैं, हाँ तो फिर आपको ये भी बताना पड़ेगा कि उस अपराध की जांच कैसे होगी? वक्ता 1 ऐफ़ आई आर कैसे लिखी जाएगी? वक्ता 2 गिरफ्तारी कैसे होगी, सबूत कैसे इकट्ठे किए जाएंगे? अदालत में कैसे पेश होंगे? वक्ता 1 अच्छा मतलब पूरी प्रक्रिया। वक्ता 3 हाँ, पूरी प्रक्रिया और ये सारी प्रक्रिया वाली बातें आती है बी एनएसएस में जो पहले सीआरपीसी था और सबूत कैसे लिए जाएंगे, कौन से सबूत मान्य होंगे? ये आता है बीएस ए में जो पहले एविडन्स अक्ट था। और जैसे मान लीजिए आपने बी एन एस में इलेक्ट्रॉनिक अपराधों को मान्यता दी। तो बीएएसए में इलेक्ट्रॉनिक सबूत को भी मान्यता देनी पड़ेगी और बीएनएसएस में बताना पड़ेगा कि वो सबूत कैसे कलेक्ट होगा। वक्ता 1 समझ गई मतलब तीनों का साथ में बदलना जरूरी था ताकि पूरा सिस्टम ठीक से काम करे। वक्ता 3 बिल्कुल तीनों एक साथ सिंक में रहे, इसीलिए ने एक साथ बदला गया। वक्ता 1 सही है, जानकारी में मौलिक कानून सबस्टेंटिव लॉ। और प्रतिकियात्मक कानून प्रोसीज़र लॉ के बीच के इस रिश्ते पर ज़ोर भी दिया गया है। वक्ता 2 और ये समझना बहुत जरूरी है। खासकर लॉ के स्टूडेंट्स या प्रोफेशनल्स के लिए। बी एन एस जो है वो मौलिक कानून है। सबस्टैंटिव लॉ ये बताता है कि आपके अधिकार क्या हैं? कौन सा काम अपराध है, उसकी सजा क्या है? ये आपके राइट्स और लायबिलिटीज़ तय करता है, ठीक है और बीएनएस जो है वो प्रतिक्रियात्मक कानून है। प्रसीजरल लॉ ये बताता है कि इन अधिकारों को लागू कैसे करवाना है। यहाँ अगर कोई अपराध हुआ है तो उसकी प्रक्रिया क्या होगी? ऐफ़ आई आर से लेकर अपील तक का पूरा रास्ता ये दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। वक्ता 1 मतलब एक बताता है क्या और दूसरा बताता है कैसे। वक्ता 2 हाँ, बहुत अच्छे से कहा आपने ये क्या है? बी एन एस और दूसरा कैसे है बी एनएसएस और बीएस ए और खासकर जजमेंट राइटिंग के लिए। मौलिक कानून यानी बीएनएस की गहरी समझ बहुत ज्यादा जरूरी है। अगर आपको यही ठीक से नहीं पता कि अपराध के तत्व क्या है, कौन सी धारा लगनी चाहिए तो प्रक्रिया चाहे कितनी भी अच्छी पता हो आप सही न्याय नहीं कर पाएंगे। चार्ज ही गलत फ्रेम हो जाएगा। वक्ता 1 हाँ, ये तो है बुनियाद तो सबस्टैंटिव लॉ ही है। तो अगर हम इस पूरी बातचीत को समेटे तो कह सकते हैं कि भारतीय न्याय संहिता सिर्फ कुछ कानूनों का एक नया सेट नहीं है। जैसा की जानकारी से पता चल रहा है, ये न्याय के प्रति नज़रिए में एक बदलाव लाने की कोशिश है। दंड से न्याय की ओर एक कदम। इसमें संगठित अपराध जैसे नए अपराधों को जगह मिली है। कम्यूनिटी सर्विस जैसी नई सजा का विकल्प है और सुधार पर ज़ोर है। वक्ता 2 हाँ बिलकुल ये एक बड़ा रेस्त्रुच्तुरिन्ग् ऑर रेथिंकिंग का प्रयास है और अब ये देखना अहम होगा कि ये कानून समय के साथ कैसे इवॉल्व होता है। जमीन पर इसका इम्प्लिमेंटेशन कैसे होता है? चुनौतियां भी है। जैसे हमने देखा वैसे वो सेडीशन वाले कानून धारा 152 की व्याख्या का सवाल है या दिल्ली है? कोर्ट ने जो पुराने कानून धारा 377 के बारे में सवाल उठाया हाँ तो इन चीजों पर या तो विधायक और स्पष्टीकरण देगी या फिर न्यायपालिका। अपनी व्याख्यायों से स्थिति साफ करेगी। वक्ता 1 तो चलिए आज की इस चर्चा को एक विचार के साथ खत्म करते हैं। जानकारी ये मानती है और शायद हम सब भी महसूस करते हैं कि सिर्फ कानून बदलने या सजा सख्त करने से अपराध कम नहीं होते। ये हमने आईपीसी के साथ भी देखा। अगर बीएनएस का असली लक्ष्य। वाकई न्याय देना है और समाज को ज्यादा सुरक्षित बनाना है तो इस नए कानूनी ढांचे के साथ साथ और किन चीजों पर ध्यान देने की जरूरत होगी? क्या ये सिर्फ सामाजिक मानसिकता बदलने की बात है? जैसा आपने कहा या फिर पुलिसिंग? जांच का तरीका न्यायपालिका की तेजी और उनके काम करने के तरीकों में बड़े सुधार की जरूरत है या फिर समाधान कहीं और छुपा है? कानून की इन किताबों से परे सोचने वाली बात है।

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