"Ek Kudaal, Ek Pahaad"- Bed Time Story in Hindi | By Leena Bandil | PIXAR STYLE | Artjio
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यह कहानी एक सूखाग्रस्त पहाड़ी गांव की है, जहां पानी की कमी से लोग परेशान थे और युवा पलायन कर रहे थे। इसी गांव में लौंगी बुयान नाम का एक साधारण किसान रहता था, जिसके पास न तो पैसा था, न ही कोई बड़ी ताकत, लेकिन उसके पास अपने गांव के लिए जिम्मेदारी की भावना थी। उसने ठान लिया कि वह पहाड़ को काटकर नदी से गांव तक पानी लाएगा। गांव वालों ने उसका मजाक उड़ाया और उसे पागल कहा, लेकिन वह रुका नहीं। वह रोज सुबह उठकर कुदाल और फावड़ा लेकर पहाड़ पर जाता और खुदाई करता। सालों बीत गए, उसके हाथ छिल गए, शरीर कमजोर पड़ गया, बाल सफेद हो गए, लेकिन उसका इरादा अडिग रहा। आखिरकार, कई वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद, उसने नहर पूरी कर ली और नदी का पानी गांव तक पहुंच गया। पानी आते ही गांव में खुशी की लहर दौड़ गई। खेत हरे-भरे हो गए, कुएं भर गए और जो युवा शहर गए थे, वे वापस लौटने लगे। लौंगी बुयान ने साबित कर दिया कि अकेला इंसान भी दृढ़ इरादे और निरंतर प्रयास से असंभव को संभव बना सकता है। उसने सिखाया कि सच्चा हीरो वही है जो अपने संघर्ष से पूरे समाज का भविष्य बदल दे।
हैलो प्यारे बच्चों, कैसे हो तुम सब होप्फुली तुम सभी सवस्थ और मस्त होंगे और इंतजार कर रहे होंगे हमारी आज की नहीं कहानी का तो बिना देर करें शुरू करते हैं।
आज की कहानी बहुत समय पहले एक दूरदराज पहाड़ी इलाके में एक छोटा सा गांव था।
गांव सुंदर था।
चारों ओर पहाड़ थे, हवा शुद्ध थे, लोग मेहनती थे, लेकिन इस गांव की सबसे बड़ी समस्या थी पानी।
बरसात के कुछ महीने छोड़ दे तो बाकी समय गांव सूखे से जूझता रहता था।
खेत बंजर पड़े रहते, कुंए सूख जाते तालाबों में दरारें पड़ जाती।
और लोगों की आँखों में चिंता साफ दिखाई देती।
सुबह होते ही गांव की औरतें घड़े लेकर मीलों दूर पानी लेने जाती।
बुजुर्ग लोग आसमान की ओर देखते और कहते हे भगवान इस बार तो बारिश अच्छी कर देना।
बच्चे भी खेल कूद से पहले यही सुनते।
हुए बड़े हो रहे थे।
पानी बचाओ पानी नहीं है।
गांव के किसान दिन रात मेहनत करते मगर पानी की कमी के कारण उनकी फसलें बार बार खराब हो जाती।
धीरे धीरे गरीबी बढ़ने लगी और सबसे दुखद बात ये थी कि गांव के जवान लड़के लड़कियां रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में गांव छोड़कर शहर जाने लगे।
गांव की गलियां सूनी होने लगी।
खेतों में हल चलाने वाले हाथ कम हो गए।
घर तो थे पर उनमें रौनक नहीं थी।
उसी गांव में रहता था एक साधारण सा आदमी लौंगी बुयान।
वह कोई बहुत पढ़ा लिखा इंसान नहीं था, ना उसके पास पैसा था, ना कोई सरकारी पद, ना कोई मशीनें, ना कोई सेना।
लेकिन उसके पास एक चीज़ थी जो बहुत कम लोगों के पास होती है।
अपने गांव के लिए जलती हुई जिम्मेदारी।
वो रोज़ अपने खेतों को सूखते देखता, रोज़ बच्चों को खाली घड़े ले जाते देखता।
रोज़ गांव के नौजवानों को शहर जाते देखता, हर बार उसका दिल भीतर से टूट जाता।
1 दिन उसने देखा कि उसकी पड़ोसन अपनी छोटी बच्ची के साथ पानी भरने गई थी।
काफी देर बाद लौटते समय बच्ची थककर रास्ते में बैठ गई और बोली माँ क्या हमारे गांव में कभी इतना पानी होगा?
क्या हमें दूर न जाना पड़े?
ये सुनकर लौंगी बुयान का दिल कांप उठा।
उस रात वह सो नहीं पाया।
वह देर तक बाहर बैठा रहा।
आसमान में चाँद था सामने ऊंचे ऊंचे पहाड़ थे और उन्हीं पहाड़ों के पार बहती थी एक नदी।
वो सोचने लगा, अगर उस नदी का पानी किसी तरह हमारे गांव तक आ जाए तो सब बदल सकता है।
उसके मन में एक पागल सा विचार आया।
क्यों ने पहाड़ को काटकर एक नहर बना दी जाए, ये एक असंभव सपना था।
अगले दिन उसने गांव के कुछ लोगों को बुलाया और कहा अगर हम पहाड़ को काटकर नदी से गांव तक एक नहर बना दे तो पानी हमारे खेतों तक आ सकता है।
कुछ पल के लिए सब लोग चुप रहे।
फिर अचानक कोई हँस पड़ा तुम अकेले पहाड़ काटोगे।
अरे यह काम इंसान का नहीं, मशीनों का है।
तुम्हारे पास पैसे हैं, सरकार भी नहीं कर पाई तो तुम कर लोगे।
कुछ लोगों ने मजाक उड़ाया, कुछ ने उसे पागल कहा, कुछ ने दया भरी नजर से देखा एक बुजुर्ग ने।
समझाते हुए कहा, बेटा सपना अच्छा है पर ये संभव नहीं लौंगी बुयान ने सबकी बातें सुनी, वह चुप रहा लेकिन उसके भीतर एक आवाज लगातार कह रही थी, अगर कोई शुरू ही नहीं करेगा तो गांव हमेशा प्यासा रहेगा।
अगली सुबह।
सूरज निकलने से पहले ही लौंगी भुयान उड़ गया, उसे कुदाल, एक फावड़ा, एक टोकरी, थोड़ी सी सूखी रोटी बांधी।
वह पहाड़ की ओर चल पड़ा।
गांव वालों ने देखा वह सचमुच जा रहा था।
किसी ने कहा 2 दिन में वापस आ जाएगा, किसी ने कहा जुनून उतर जाएगा।
लेकिन वो रुका नहीं।
वो पहाड़ के उस हिस्से पर पहुंचा जहाँ से नदी का रास्ता गांव तक लाया जा सकता था।
वहाँ पत्थर थे, चट्टा नहीं थी, काँटे थे, धूप थी, सामने एक बहुत लम्बी लड़ाई थी।
उसने कुदाल उठाई और पहाड़ पर पहला वार किया।
ठक।
उस एक चोट के साथ मानो उसे अपनी किस्मत नहीं बल्कि पूरे गांव की तकदीर बदलने की शुरुआत की।
दिन महीने साल बीतते गए, शुरुआत बेहद कठिन थी।
पत्थर बहुत कठोर थे, कई बार उसकी हथेलियां छिल जाती।
कभी पैर में चोट लग जाती, कभी तेज धूप उसे कमजोर कर देती, कभी बारिश में कीचड़ सब काम बिगाड़ देता, लेकिन वह रोज़ जाता।
सुबह से शाम तक खुदाई करता, पत्थर हटा, मिट्टी निकालता रास्ता बनाता, शाम को थका हारा, घर लौटता लोगों से देखकर।
उस पर दया करते और कुछ हस्ते 1 दिन एक आदमी ने ताना मारा, कितने साल लगाओगे लौंगी बुयान मुस्कुराकर बोला जीतने भी लगे अगर मेरे जीते जी पानी आ गया तो वही मेरी जीत होगी।
शुरू के महीनों में लोग उसका मजाक उड़ाते रहे।
बच्चे भी कभी कभी कहते हैं देखो पहाड़ काटने वाला आदमी जा रहा है लेकिन लौंगी बुआ नाराज नहीं होता था, वो जानता था लोग हँसते तब है जब उन्हें परिणाम दिखाई नहीं देता।
उसे परिणाम दिखाई दे रहा था, भले ही दुनिया को नहीं, उसने अपने मन में एक तस्वीर बना ली थी।
खेतों में हरियाली।
कुओं में पानी, बच्चों के चेहरे पर खुशी, गांव में लौटते जवान औरतों के सिर में से पानी के घड़ों का बोझ कम, वो उसी तस्वीर के सहारे काम करता रहता।
हर महान संघर्ष में कुछ ऐसे पल आते हैं जब इंसान बाहर से नहीं अंदर से हारने लगता है।
लौंगी बुयान की जिंदगी में भी ऐसे पल आए।
एक बार लगातार कई दिनों कि बारिश ने उसकी की हुई खुदाई का बड़ा हिस्सा बहा दिया।
एक वह पहाड़ के पास बैठा देर तक उस टूटे हुए रास्ते को देखता रहा।
उसकी आँखें भर आई।
उसे धीरे से कहा, क्या सच में मैं ये कर पाऊंगा?
उसी समय उसे उसे अपनी माँ की एक पुरानी बात याद आई।
बेटा बड़ा काम ताकत से नहीं टिके रहने से होता है।
वह उठा, उसे आंसू पोछे और अगले ही दिन फिर काम पर लग गया।
धीरे धीरे पहाड़ हारने लगा।
साल बीतते गए।
जहाँ पहले ठोस चट्टान थी, वहाँ अब तक एक लंबी गहरी लकीर दिखने लगी थी।
पहाड़ पर अब उसके संघर्ष के निशान साफ़ दिखने लग गए थे।
गांव के कुछ लोग जो पहले हँसते थे अब चुपचाप दूर खड़े होकर उसे देखने लगे।
किसी ने पहली बार कहा ये आदमी सच में रुकने वाला नहीं है।
कुछ युवाओं ने एक 2 दिन उसकी मदद भी की, लेकिन नियमित रूप से साथ देना आसान नहीं था।
अधिकतर लोग फिर अपने अपने कामों में लग जाते पर लौंगी बुयान का नियम नहीं टूटा।
वो जानता था जब तक रास्ता पूरा नहीं बनेगा पानी नहीं आएगा और जब तक पानी नहीं आएगा।
गांव नहीं बचेगा एक काम यह काम कोई एक मौसम 1 साल या 2 साल का नहीं था।
यह दर्शकों की तपस्या थी।
लौंगी बुयान की जवानी धीरे धीरे ढलने लगी।
उसके बाल सफेद होने लगे, चेहरे पर झुर्रियां आ गई।
लेकिन उसके इरादे और मजबूत होते गए।
अब गांव के बच्चे जो इसका कभी उसका मजाक उड़ाते थे, बड़े हो चूके थे, वे अपने बच्चों को उसकी ओर इशारा करके कहते देखो यह वही आदमी है जो हमारे गांव के लिए पहाड़ काट रहा है।
धीरे धीरे मजाक सम्मान में बदलने लगा।
फिर 1 दिन कई वर्षों की खुदाई के बाद एक रास्ता लगभग तैयार हो चुका था।
नदी का पानी बस थोड़ा सा मोड़ लेने की देर में था।
उस दिन लौंगी बुयान बहुत शांत था।
उसने अंतिम हिस्से की खुदाई शुरू की।
उसके हाथ कांप रहे थे।
लेकिन मन अडिग था।
गांव के कुछ लोग भी उस दिन वहाँ मौजूद थे।
सबकी सांसे थमी हुई थी।
उसने एक बड़ा पत्थर हटाया, फिर मिट्टी की दीवार को तोड़ा और कुछ ही पलों बाद पहले एक पतली धारा निकली।
फिर पानी तेज हुआ और अचानक।
नदी का पानी उस नहर में बहने लगा।
पानी सचमुच पानी गांव की ओर बढ़ रहा था।
लौंगी बुयान कुछ क्षण तक बस उसे देखता रहा।
फिर उसके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान आई जिसमें दर्शकों का दर्द, संघर्ष, उम्मीद और जीत तक सब शामिल था।
गांव के लोग खुशी से चिल्ला उठे, पानी आ गया, पानी आ गया, बच्चे दौड़ने लगे, औरतों की आँखों से आंसू निकल पड़े।
बुजुर्ग हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
उस दिन गांव में किसी त्यौहार से कम माहौल नहीं था।
जब पानी आया तो सिर्फ खेत नहीं।
किस्मत भी हरी हुई।
कुछ ही महीनों में बदलाव दिखने लगा।
जो खेत तले सूखे पड़े रहते थे वहाँ अब हरी भरी फसलें लहलहाने लगी, कुएं भरने लगे पशुओं को पानी मिलने लगा, गांव में सब्जियां उगने लगीं, लोगों की आमदनी बढ़ने लगी और सबसे खूबसूरत बदलाव ये हुआ।
जो नौजवान गांव छोड़कर जा रहे थे, उनमें से कई वापस आने लगे।
अब गांव में काम था, खेती थी, उम्मीद थी गांव की औरतें जिन्हें कई मीलों दूर पानी लाना पड़ता था, वो मुस्कराते हुए कहती, एक आदमी ने हमारी पीठ का बोझ हल्का कर दिया।
बच्चे पानी के पास खेलते।
और शायद उन्हें ये अंदाजा भी नहीं था कि उसके लिए उनके लिए यह पानी कितनी बड़ी लड़ाई जीतकर आया है।
एक शाम गांव के कुछ बुजुर्ग और वही लोग जिन्होंने कभी उसका मजाक उड़ाया था।
लौंगी बुयान के घर पहुंचे, उनमें से एक ने सिर झुका कर कहा, हमें माफ़ कर दो।
हमने तुम्हारी हँसी उड़ाई, हमने तुम्हें पागल कहा लेकिन तुमने जो किया वो हम में से कोई नहीं कर पाया लौंगी बुयान ने बहुत सरलता से उत्तर दिया, अगर तुम सबने मेरी हँसी उड़ाई तो भी ठीक ही हुआ, क्योंकि उस हँसी ने मुझे और मजबूत बना दिया।
फिर उसने मुस्कराकर कहा, मैंने पहाड़ नहीं काटा।
मैंने सिर्फ हार मानने से इनकार किया है।
लौंगी बुयान कोई राजा नहीं था, कोई मंत्री नहीं था, कोई बड़े मंचों पर भाषण देने वाला इंसान नहीं था।
वो एक साधारण ग्रामीण था, लेकिन इतिहास अक्सर साधारण दिखने वाले लोगों उन्हीं लोगों से बनता है।
जो असाधारण धैर्य रखते हैं।
उसने हमें ये सिखाया कि बड़े बदलाव के लिए हमेशा बड़ी ताकत नहीं चाहिए, बड़ा इरादा चाहिए।
दुनिया पहले हंसेगी फिर सवाल करेगी, फिर देखेगी और अंत में वही दुनिया ताली बजाएगी और सबसे बड़ी बात।
जो इंसान सिर्फ अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जीता है, उसका जीवन कभी छोटा नहीं होता तो यही थी हमारी कहानी।
इस कहानी से हमने क्या सीखा?
हमने ये सीखा कि असंभव सिर्फ तब तक असंभव है जब तक कोई उसे शुरू नहीं करता अगर नियत साफ हो।
इरादा मजबूत हो तो अकेला इंसान भी समाज की दिशा बदल सकता है।
लोग शुरुआत में मजाक उड़ाते हैं लेकिन परिणाम मिलने पर वही सम्मान करते हैं।
धैर्य, निरंतरता, सेवा भाव सबसे बड़ी ताकत है।
सच्चा हीरो वो नहीं है।
जो सिर्फ अपने सपने पूरे करे बल्कि वो है जो अपने संघर्ष से पूरे समाज का भविष्य बदल दे।
तो ये थे लेसन्स जो हमने आज की कहानी से सीखे होप्फुली ये स्टोरी आपको पसंद आई होगी?
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Podcast Summary
Key Points:
एक दूरदराज पहाड़ी गांव में पानी की भारी कमी थी, जिससे खेत बंजर हो गए और लोग पलायन करने लगे।
लौंगी बुयान नाम का एक साधारण किसान अकेले पहाड़ काटकर नदी से गांव तक नहर बनाने का असंभव सपना देखता है।
गांव वाले पहले उसका मजाक उड़ाते हैं, लेकिन वह वर्षों तक अथक परिश्रम करता रहता है।
कई सालों की कड़ी मेहनत और धैर्य के बाद, वह नहर पूरी करता है और पानी गांव तक पहुंच जाता है।
पानी आने से गांव में हरियाली लौट आती है, लोग वापस आते हैं और सबका जीवन बदल जाता है।
कहानी सिखाती है कि बड़े बदलाव के लिए बड़ी ताकत नहीं, बल्कि बड़ा इरादा और निरंतरता चाहिए।
Summary:
यह कहानी एक सूखाग्रस्त पहाड़ी गांव की है, जहां पानी की कमी से लोग परेशान थे और युवा पलायन कर रहे थे। इसी गांव में लौंगी बुयान नाम का एक साधारण किसान रहता था, जिसके पास न तो पैसा था, न ही कोई बड़ी ताकत, लेकिन उसके पास अपने गांव के लिए जिम्मेदारी की भावना थी। उसने ठान लिया कि वह पहाड़ को काटकर नदी से गांव तक पानी लाएगा। गांव वालों ने उसका मजाक उड़ाया और उसे पागल कहा, लेकिन वह रुका नहीं। वह रोज सुबह उठकर कुदाल और फावड़ा लेकर पहाड़ पर जाता और खुदाई करता। सालों बीत गए, उसके हाथ छिल गए, शरीर कमजोर पड़ गया, बाल सफेद हो गए, लेकिन उसका इरादा अडिग रहा। आखिरकार, कई वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद, उसने नहर पूरी कर ली और नदी का पानी गांव तक पहुंच गया। पानी आते ही गांव में खुशी की लहर दौड़ गई। खेत हरे-भरे हो गए, कुएं भर गए और जो युवा शहर गए थे, वे वापस लौटने लगे। लौंगी बुयान ने साबित कर दिया कि अकेला इंसान भी दृढ़ इरादे और निरंतर प्रयास से असंभव को संभव बना सकता है। उसने सिखाया कि सच्चा हीरो वही है जो अपने संघर्ष से पूरे समाज का भविष्य बदल दे।
FAQs
लौंगी बुयान एक साधारण ग्रामीण था जो अपने गाँव के लिए पहाड़ काटकर नहर बनाने का असंभव सपना देखता था।
गाँव में पानी की भारी कमी थी, जिससे खेत बंजर पड़ जाते, कुएँ सूख जाते और लोगों को मीलों दूर पानी लाना पड़ता था।
उसने एक बच्ची को पानी के लिए तरसते देखा और अपने गाँव की प्यास मिटाने के लिए पहाड़ काटने का निर्णय लिया।
शुरू में लोग उसका मजाक उड़ाते थे और उसे पागल कहते थे, लेकिन धीरे-धीरे सम्मान देने लगे।
उसने कई वर्षों तक अकेले कुदाल और फावड़े से पहाड़ खोदा, और अंत में नदी का पानी गाँव तक लाने में सफल हुआ।
खेत हरे-भरे हो गए, कुएँ भर गए, लोगों की आमदनी बढ़ी और नौजवान वापस गाँव लौटने लगे।
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